हक़ीक़त खुल गई हसरत तिरे तर्क-ए-मोहब्बत की... पढ़िये हसरत मोहानी के चुनिंदा शेर


2024/02/15 14:19:45 IST

ज़ुल्म ओ सितम

    उस ना-ख़ुदा के ज़ुल्म ओ सितम हाए क्या करूँ, कश्ती मिरी डुबोई है साहिल के आस-पास.

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इश्क़ भी ख़ुद-ग़रज़

    मिरा इश्क़ भी ख़ुद-ग़रज़ हो चला है, तिरे हुस्न को बेवफ़ा कहते कहते.

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तर्क-ए-मोहब्बत

    हक़ीक़त खुल गई 'हसरत' तिरे तर्क-ए-मोहब्बत की, तुझे तो अब वो पहले से भी बढ़ कर याद आते हैं.

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तसल्ली पर शायरी

    मानूस हो चला था तसल्ली से हाल-ए-दिल, फिर तू ने याद आ के ब-दस्तूर कर दिया.

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मसीहाई का दा'वा

    मुझ को देखो मिरे मरने की तमन्ना देखो, फिर भी है तुम को मसीहाई का दा'वा देखो.

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इब्तिदा-ए-शौक़

    है इंतिहा-ए-यास भी इक इब्तिदा-ए-शौक़, फिर आ गए वहीं पे चले थे जहाँ से हम.

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गोया ख़फ़ा नहीं

    मिलते हैं इस अदा से कि गोया ख़फ़ा नहीं, क्या आप की निगाह से हम आश्ना नहीं.

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