मकर संक्रांति: सूर्य, फसल और सनातन परंपरा का महापर्व
पर्व की प्राचीन जड़ें
मकर संक्रांति की शुरुआत वैदिक काल से मानी जाती है, जब सूर्य को जीवन और कृषि का आधार माना गया.
Credit: social mediaसूर्य का उत्तरायण
इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और उत्तरायण शुरू होता है, जिसे शुभ और देवताओं का समय कहा गया है.
Credit: social media शुभ कार्यों की शुरुआत
खरमास समाप्त होता है और विवाह, यज्ञ, पूजा जैसे शुभ कार्य दोबारा शुरू होते हैं.
Credit: social mediaफसल का उत्सव
नई फसल के आगमन पर सूर्य देव को धन्यवाद देने का पर्व है, इसी कारण खिचड़ी और नए अनाज का भोग लगाया जाता है.
Credit: social mediaगोरखनाथ से जुड़ाव
गोरखपुर में बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा इसी कृषि और सूर्य पूजा से जुड़ी है.
Credit: social mediaदान और पुण्य का दिन
तिल, गुड़, अनाज और वस्त्र का दान करने से विशेष पुण्य मिलता है, इसलिए इसे 'दान का पर्व' भी कहते हैं.
Credit: social media अलग-अलग नाम, एक भावना
कहीं खिचड़ी, कहीं पोंगल, कहीं उत्तरायण, तो कहीं बिहू — रूप अलग, भाव एक.
Credit: social media प्रकृति से जुड़ाव का संदेश
मकर संक्रांति हमें सूर्य, धरती और जीवन के प्रति कृतज्ञ होना सिखाती है.
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