मकर संक्रांति: सूर्य, फसल और सनातन परंपरा का महापर्व


2026/01/15 15:47:18 IST

पर्व की प्राचीन जड़ें

    मकर संक्रांति की शुरुआत वैदिक काल से मानी जाती है, जब सूर्य को जीवन और कृषि का आधार माना गया.

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सूर्य का उत्तरायण

    इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और उत्तरायण शुरू होता है, जिसे शुभ और देवताओं का समय कहा गया है.

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शुभ कार्यों की शुरुआत

    खरमास समाप्त होता है और विवाह, यज्ञ, पूजा जैसे शुभ कार्य दोबारा शुरू होते हैं.

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फसल का उत्सव

    नई फसल के आगमन पर सूर्य देव को धन्यवाद देने का पर्व है, इसी कारण खिचड़ी और नए अनाज का भोग लगाया जाता है.

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गोरखनाथ से जुड़ाव

    गोरखपुर में बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा इसी कृषि और सूर्य पूजा से जुड़ी है.

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दान और पुण्य का दिन

    तिल, गुड़, अनाज और वस्त्र का दान करने से विशेष पुण्य मिलता है, इसलिए इसे 'दान का पर्व' भी कहते हैं.

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अलग-अलग नाम, एक भावना

    कहीं खिचड़ी, कहीं पोंगल, कहीं उत्तरायण, तो कहीं बिहू — रूप अलग, भाव एक.

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प्रकृति से जुड़ाव का संदेश

    मकर संक्रांति हमें सूर्य, धरती और जीवन के प्रति कृतज्ञ होना सिखाती है.

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