यूक्रेन में भारतीय सैनिक भेजने का सुझाव! ट्रंप ने हंसते हुए किया इनकार, किताब में हुआ बड़ा खुलासा
डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल पर आधारित एक नई किताब में भारत, यूक्रेन युद्ध और व्हाइट हाउस की अहम बैठकों से जुड़े कई दिलचस्प दावे किए गए हैं. किताब में किए गए कुछ दावों ने अमेरिका की विदेश नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

नई दिल्ली: अमेरिकी राजनीति से जुड़ी एक नई किताब ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा छेड़ दी है. किताब में किए गए कुछ दावों ने न सिर्फ अमेरिका की विदेश नीति पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि भारत का नाम भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ में सामने आया है. दावा किया गया है कि यूक्रेन युद्ध को लेकर व्हाइट हाउस में हुई एक अहम बैठक के दौरान भारत को शांति सेना के रूप में शामिल करने का सुझाव दिया गया था, लेकिन तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस प्रस्ताव को गंभीरता से नहीं लिया.
न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार मैगी हेबरमैन और जोनाथन स्वान द्वारा लिखी गई किताब Regime Change: Inside the Imperial Presidency of Donald Trump में कई अंदरूनी बैठकों और निर्णयों का जिक्र किया गया है. इसी किताब में दावा किया गया है कि यूक्रेन संकट को लेकर व्हाइट हाउस में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान भारत का नाम शांति सेना के संभावित विकल्प के रूप में सामने आया था. किताब के अनुसार, इस सुझाव पर राष्ट्रपति ट्रंप की प्रतिक्रिया काफी अलग थी और उन्होंने इसे व्यावहारिक नहीं माना.
ओवल ऑफिस में हुई अहम बैठक
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले वर्ष 30 जनवरी को व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई थी. इस बैठक में अमेरिका के कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे. रक्षा और विदेश नीति से जुड़े शीर्ष अधिकारियों के अलावा उद्योगपति एलन मस्क भी इसमें शामिल बताए गए हैं. बैठक का मुख्य उद्देश्य रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे संघर्ष को समाप्त करने के लिए संभावित रणनीति पर चर्चा करना था. इस दौरान युद्धविराम और शांति व्यवस्था कायम करने के विभिन्न विकल्पों पर विचार किया गया.
जेडी वेंस ने दिया था अलग सुझाव
किताब में कहा गया है कि जब यूक्रेन में नाटो देशों के सैनिकों की तैनाती पर चर्चा हुई तो अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस पर आपत्ति जताई. उनका मानना था कि नाटो देशों की सीधी भागीदारी रूस के साथ तनाव को और बढ़ा सकती है. इसके बजाय उन्होंने सुझाव दिया कि यूरोप के बाहर के देशों के सैनिकों को शांति मिशन का हिस्सा बनाया जा सकता है. इसी संदर्भ में भारत और सऊदी अरब जैसे देशों का नाम सामने आया.
ट्रंप ने क्यों नहीं माना प्रस्ताव?
लेखकों के अनुसार, जेडी वेंस की बात सुनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने इस विचार को गंभीरता से नहीं लिया. किताब में दावा किया गया है कि ट्रंप का मानना था कि भारत इस तरह के मिशन में शामिल होने के लिए आगे नहीं आएगा. बताया गया है कि उन्होंने भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपने अच्छे संबंधों का भी उल्लेख किया. साथ ही उन्होंने यह राय व्यक्त की कि भारत ऐसे किसी बाहरी सैन्य अभियान में संसाधन लगाने से बचना पसंद करेगा.
टेक उद्योग की बैठक में भी आया भारत का जिक्र
किताब में एक अन्य घटना का भी उल्लेख किया गया है, जो अमेरिकी व्यापार और विनिर्माण नीति से जुड़ी है. बताया गया है कि व्हाइट हाउस में आयोजित एक बैठक के दौरान देश की बड़ी तकनीकी कंपनियों के प्रमुख मौजूद थे. इस बैठक में अमेरिका में निवेश और उत्पादन बढ़ाने को लेकर चर्चा हो रही थी. इसी दौरान ट्रंप ने विदेशी देशों पर लगाए जाने वाले शुल्क और व्यापारिक नीतियों को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की.
टैरिफ को लेकर ट्रंप का सख्त रुख
किताब के अनुसार, ट्रंप ने स्पष्ट किया था कि जो कंपनियां अमेरिका में उत्पादन नहीं करेंगी, उन्हें भारी आयात शुल्क का सामना करना पड़ सकता है. उन्होंने भारत और चीन जैसे देशों के साथ व्यापारिक असंतुलन का भी जिक्र किया. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में नीतिगत फैसलों को लेकर काफी स्वतंत्र रुख अपनाना चाहते थे और कई मामलों में अपने अनुभव तथा व्यावसायिक सोच को प्राथमिकता देते थे. वहीं, बता दें कि इस किताब में वर्णित घटनाओं और बातचीत की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.


