ट्रंप प्रशासन की ‘एंटी-वेपनाइजेशन’ योजना पर लगा ब्रेक, विवादित फंड पर कोर्ट ने लगाई रोक
अमेरिका में ट्रंप प्रशासन की एक महत्वाकांक्षी योजना कानूनी विवादों में घिर गई है. एक संघीय अदालत ने उस विवादित फंड पर फिलहाल रोक लगा दी है, जिसे ट्रंप प्रशासन कथित तौर पर सरकारी एजेंसियों द्वारा निशाना बनाए गए लोगों को मुआवजा देने के लिए शुरू करना चाहता था.

नई दिल्ली: अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार को बड़ा झटका लगा है. एक संघीय अदालत ने उस विवादित फंड पर फिलहाल रोक लगा दी है, जिसे ट्रंप प्रशासन कथित तौर पर सरकारी एजेंसियों द्वारा निशाना बनाए गए लोगों को मुआवजा देने के लिए शुरू करना चाहता था. इस फैसले के बाद इस योजना को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस और तेज हो गई है. वर्जीनिया के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट की जज लियोनी ब्रिकेंमा ने शुक्रवार को अंतरिम आदेश जारी करते हुए कहा कि अदालत द्वारा मामले की आगे सुनवाई पूरी होने तक ट्रंप प्रशासन इस फंड से जुड़ी किसी भी नई प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ा सकता.
अदालत का यह आदेश कम से कम 12 जून तक प्रभावी रहेगा. यह फंड हाल ही में एक कानूनी समझौते के तहत प्रस्तावित किया गया था. यह समझौता ट्रंप प्रशासन और अमेरिकी कर विभाग (IRS) के बीच उस विवाद को समाप्त करने के लिए किया गया था, जो ट्रंप के टैक्स रिकॉर्ड लीक होने के मामले से जुड़ा था. इसके बाद न्याय विभाग ने लगभग 1.776 अरब डॉलर के "एंटी-वेपनाइजेशन फंड" की घोषणा की थी.
क्या है "एंटी-वेपनाइजेशन फंड"?
प्रस्तावित योजना के अनुसार, इस फंड का संचालन पांच सदस्यों वाले एक स्वतंत्र आयोग के हाथ में होता. यह आयोग उन लोगों के दावों की समीक्षा करता जो खुद को सरकारी एजेंसियों द्वारा अनुचित जांच, कार्रवाई या राजनीतिक कारणों से निशाना बनाए जाने का शिकार बताते. डोनाल्ड ट्रंप और उनके समर्थक लंबे समय से "लॉफेयर" और "वेपनाइजेशन" जैसे शब्दों का इस्तेमाल अपने खिलाफ हुई जांचों और कानूनी मामलों का वर्णन करने के लिए करते रहे हैं. इसी सोच के आधार पर इस फंड की अवधारणा सामने लाई गई थी.
घोषणा के साथ ही शुरू हो गया विवाद
फंड की घोषणा होते ही इसे लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया. आलोचकों का कहना है कि इस योजना का लाभ ऐसे लोगों को भी मिल सकता है, जो 6 जनवरी 2021 को अमेरिकी संसद भवन कैपिटल हिल में हुई हिंसा से जुड़े मामलों में जांच या मुकदमे का सामना कर चुके हैं. विरोधियों का आरोप है कि यह फंड वास्तव में कुछ विशेष राजनीतिक विचारधारा से जुड़े लोगों को लाभ पहुंचाने का माध्यम बन सकता है. इसी वजह से कई संगठनों और नागरिक समूहों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया.
अदालत में पहुंचा मामला
फंड को चुनौती देने वाले संगठन का कहना है कि ट्रंप-वेंस प्रशासन ने राजनीतिक विरोधियों के साथ भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया है. संगठन का दावा है कि इस योजना से केवल कुछ खास लोगों को फायदा मिलने की संभावना थी, जबकि वैचारिक रूप से अलग सोच रखने वाले लोगों को इससे बाहर रखा जा सकता था. संगठन के प्रमुख स्काई पेरिमेन ने अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह पारदर्शिता और कानून के शासन की जीत है. उनके मुताबिक, सरकारी धन का इस्तेमाल किसी भी राजनीतिक उद्देश्य या विशेष समूह को लाभ पहुंचाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए.
ट्रंप प्रशासन ने जताया भरोसा
हालांकि अदालत के आदेश के बावजूद अमेरिकी न्याय विभाग ने इस योजना की वैधता पर अपना भरोसा कायम रखा है. विभाग के एक प्रवक्ता ने कहा कि सरकार को विश्वास है कि यह फंड कानूनी रूप से पूरी तरह मजबूत है और इसका उद्देश्य उन लोगों को राहत देना है, जिन्हें राजनीतिक कारणों से नुकसान उठाना पड़ा. प्रशासन का कहना है कि वह अदालत में अपने पक्ष को मजबूती से रखेगा और योजना को उचित साबित करने की कोशिश करेगा.
रिपब्लिकन नेताओं ने भी उठाए सवाल
दिलचस्प बात यह है कि इस फंड को लेकर सिर्फ विपक्ष ही नहीं, बल्कि कुछ रिपब्लिकन नेताओं ने भी चिंता जताई है. उनका मानना है कि करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल ऐसे मामलों में बेहद सावधानी के साथ होना चाहिए. कुछ नेताओं ने सवाल उठाया कि यदि इस योजना का लाभ उन लोगों तक पहुंचता है जो गंभीर कानूनी मामलों में शामिल रहे हैं, तो इससे गलत संदेश जा सकता है.
फिलहाल अदालत ने फंड में धनराशि स्थानांतरित करने और इसके संचालन से जुड़ी सभी प्रक्रियाओं पर अस्थायी रोक लगा दी है. न्याय विभाग पहले कह चुका था कि घोषणा के 60 दिनों के भीतर फंड में राशि भेज दी जाएगी, लेकिन अब यह संभव नहीं होगा.


