मिडिल ईस्ट की जंग से भारत पर मंडराया खतरा! तेल सप्लाई पर ब्रेक लगने के बाद क्या होगा बैकअप प्लान?

अमेरिका-इजरायल हमले में अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य बंद कर दिया. इससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर संकट गहराया है. क्रूड ऑयल कीमतों में उछाल से भारत की अर्थव्यवस्था और महंगाई पर असर पड़ सकता है.

Shraddha Mishra

नई दिल्ली: मध्य पूर्व से उठता धुआं अब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर छाने लगा है. अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य टकराव सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर वैश्विक बाजारों पर साफ दिखने लगा है. इजरायली हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद हालात और ज्यादा गंभीर हो गए. जवाबी कदम उठाते हुए ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने का फैसला किया, जिससे पूरी दुनिया में चिंता बढ़ गई है.

होर्मुज जलडमरूमध्य को वैश्विक तेल सप्लाई की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है. दुनिया का करीब 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है. ऐसे में अगर यह रास्ता बंद होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की उपलब्धता पर सीधा असर पड़ता है.

हाल के दिनों में ब्रेंट क्रूड की कीमत 73 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है. पिछले एक महीने में कीमतों में करीब 6 डॉलर की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव लंबा चला, तो कच्चे तेल की कीमतें 100 से 110 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं. ऐसा हुआ तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगेगा.

भारत पर पड़ेगा क्या असर?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने से देश का आयात बिल बढ़ना तय है. हालांकि, फिलहाल आम लोगों को तुरंत राहत मिल सकती है क्योंकि पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में लंबे समय से बड़ा बदलाव नहीं हुआ है. सरकारी तेल कंपनियां वैश्विक उतार-चढ़ाव का सीधा बोझ तुरंत उपभोक्ताओं पर नहीं डालतीं.

लेकिन अगर संकट लंबा खिंचता है, तो इसका असर धीरे-धीरे दिख सकता है. महंगा कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरी कंपनियों के मुनाफे को कम कर सकता है. साथ ही, ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च होने से चालू खाता घाटा बढ़ सकता है. इससे रुपये पर दबाव बनना स्वाभाविक है, जो महंगाई को और बढ़ा सकता है.

भारत के पास बैकअप!

होर्मुज जलडमरूमध्य भारत के लिए बेहद अहम है. देश के लगभग 40 प्रतिशत कच्चे तेल और 55 प्रतिशत एलएनजी आयात इसी रास्ते से होते हैं. ऐसे में इस मार्ग पर कोई भी रुकावट भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने वैकल्पिक योजनाओं पर काम तेज कर दिया है. कोशिश की जा रही है कि ऐसे बंदरगाहों से तेल की आपूर्ति हो, जो होर्मुज मार्ग पर निर्भर न हों. सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के अन्य बंदरगाहों से सप्लाई बढ़ाने की रणनीति बनाई जा रही है. इसके अलावा, खाड़ी क्षेत्र से बाहर के तेल उत्पादक देशों से अतिरिक्त खरीद की तैयारी भी की जा रही है.

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