पंजाब समाचार: दशकों से पंजाब के किसान धान और गेहूँ के चक्र में फँसे हुए थे। धान की फसल से निश्चित लाभ तो मिलता था, लेकिन इसमें पानी की भारी खपत होती थी। भूजल स्तर खतरनाक स्तर तक गिर गया था और पारंपरिक फसलों से होने वाली आय में भारी गिरावट आई थी। किसान बढ़ते कर्ज और सीमित विकल्पों के कारण तनाव में थे। इससे निपटने का एकमात्र उपाय फसल विविधीकरण था, जिसे अब राज्य सरकार ने अपना लिया है।
इस साल, पंजाब में मक्के की खेती में रिकॉर्ड 16.27% की वृद्धि दर्ज की गई है। पिछले साल 86,000 हेक्टेयर की तुलना में अब रकबा 1,00,000 हेक्टेयर को पार कर गया है। यह उपलब्धि दर्शाती है कि किसान अब वैकल्पिक फसलों को अपनाने के लिए तैयार हैं। यह कदम न केवल आर्थिक, बल्कि भावनात्मक भी है, जो साबित करता है कि जब किसान सुरक्षित महसूस करते हैं तो बदलाव संभव है। मक्का क्रांति की शुरुआत हो चुकी है।
मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार ने मक्का की खेती को बढ़ावा देने के लिए योजनाएँ शुरू कीं। छह ज़िलों में, एक पायलट प्रोजेक्ट के तहत 12,000 हेक्टेयर ज़मीन धान से मक्का की खेती में बदल दी गई। मक्का अपनाने वाले किसानों को प्रति हेक्टेयर ₹17,500 की राशि के साथ-साथ 185 प्रशिक्षित क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन भी मिलता है। इसके अतिरिक्त, ₹7,000 प्रति एकड़ की सब्सिडी भी किसानों को समायोजन में मदद करती है। इस सहायता से लगभग 30,000 किसानों को सीधा लाभ होगा।
पठानकोट, संगरूर, बठिंडा, जालंधर, कपूरथला और गुरदासपुर जैसे ज़िले सबसे आगे हैं। पठानकोट में नई सब्सिडी योजना के तहत सबसे ज़्यादा 4,100 एकड़ ज़मीन हासिल हुई। अन्य ज़िलों में भी उत्साहजनक आँकड़े देखने को मिले, जहाँ किसानों ने प्रोत्साहनों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। सरकार का मानना है कि ये नतीजे पूरे राज्य के लिए एक मिसाल कायम करेंगे। धान की जगह मक्के की खेती के साथ पंजाब का कृषि परिदृश्य स्पष्ट रूप से बदल रहा है।
कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुडियां ने जिला स्तर पर समितियों को मक्के की सुचारू खरीद सुनिश्चित करने के आदेश दिए। किसानों को सलाह दी गई कि वे नुकसान से बचने के लिए मंडियों में सूखा मक्का लाएँ। अधिकारियों ने ज़ोर देकर कहा कि बेहतर दामों के लिए नमी की मात्रा 14% से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए। सरकार किसानों में विश्वास पैदा करते हुए बाज़ार में उचित मूल्य दिलाने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही है।
धान के विपरीत, मक्का बहुत कम पानी की खपत करता है, जो इसे पंजाब के भविष्य के लिए आदर्श बनाता है। मक्का उगाने वाले किसान न केवल भूजल बचाते हैं, बल्कि अधिक लाभ भी प्राप्त करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव टिकाऊ खेती के लिए बेहद ज़रूरी है। यह आंदोलन किसानों को आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संसाधनों की रक्षा करके धरती माता का ऋण चुकाने का एक उदाहरण है। मक्का पंजाब की आशा की फसल बनकर उभर रहा है।
मक्का क्रांति पंजाब की भावनात्मक और आर्थिक जीत है। जब सरकारी नीतियाँ न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और समर्थन का आश्वासन देती हैं, तो किसान साहसिक कदम उठाते हैं। पंजाब एक संतुलित और समृद्ध कृषि मॉडल की ओर बढ़ रहा है। यह बदलाव धान पर निर्भरता से मुक्ति का संकेत है। किसान और सरकार मिलकर यह साबित कर रहे हैं कि चुनौतियों को हराया जा सकता है। एक नई हरित लहर, जो वास्तव में 'रंगला पंजाब' को दर्शाती है, पूरे देश में मज़बूत हो रही है। First Updated : Monday, 06 October 2025