नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ एक बड़े नागरिक परमाणु समझौते को मंजूरी दे दी है. रिपोर्टों के मुताबिक, इस समझौते के तहत सऊदी अरब को अपने देश में यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिलने की संभावना है. हालांकि, समझौते में कुछ ऐसे कड़े सुरक्षा प्रावधान शामिल नहीं हैं, जिन्हें अमेरिका आमतौर पर परमाणु तकनीक के सैन्य इस्तेमाल को रोकने के लिए जरूरी मानता रहा है.
वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अधिकारियों के हवाले से बताया कि यह समझौता करीब 30 वर्षों तक चल सकता है और इसमें अरबों डॉलर का निवेश शामिल होगा. इसके तहत अमेरिकी कंपनियों को सऊदी अरब के नागरिक परमाणु कार्यक्रम के निर्माण में बड़ी भूमिका मिलने की उम्मीद है. इस व्यवस्था से अमेरिकी कंपनियों को फायदा होगा, जबकि अन्य देशों की कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा का अवसर काफी सीमित हो सकता है.
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन आने वाले दिनों में इस समझौते को अमेरिकी कांग्रेस के सामने रख सकता है. प्रस्तावित पैकेज में '123 समझौता' भी शामिल होगा. यह वह कानूनी ढांचा है, जिसके तहत अमेरिका दूसरे देशों के साथ परमाणु ऊर्जा से जुड़े सहयोग को नियंत्रित करता है. हालांकि, रिपोर्टों के अनुसार इस समझौते में वह प्रावधान शामिल नहीं है जिसे परमाणु प्रसार रोकने के लिए 'गोल्ड स्टैंडर्ड' कहा जाता है. इस व्यवस्था के तहत किसी देश को यूरेनियम संवर्धन और इस्तेमाल किए गए परमाणु ईंधन से प्लूटोनियम निकालने जैसी गतिविधियों से रोका जाता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि यूरेनियम संवर्धन और प्लूटोनियम का पुनर्संसाधन परमाणु हथियार बनाने के लिए जरूरी सामग्री हासिल करने के दो प्रमुख रास्ते हैं. यदि किसी देश को इन गतिविधियों की अनुमति मिलती है और उस पर पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय निगरानी नहीं होती, तो परमाणु प्रसार का खतरा बढ़ सकता है. नागरिक परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल करने वाले कई देश परमाणु ईंधन का उत्पादन खुद करने के बजाय अंतरराष्ट्रीय निगरानी के तहत संवर्धित ईंधन दूसरे देशों से प्राप्त करते हैं. ऐसे में सऊदी अरब को घरेलू स्तर पर यूरेनियम संवर्धन की अनुमति देने का प्रस्ताव सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच चिंता पैदा कर रहा है.
रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि समझौते के तहत सऊदी अरब को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी IAEA के अतिरिक्त प्रोटोकॉल को अपनाना जरूरी नहीं होगा. यह प्रोटोकॉल परमाणु गतिविधियों की निगरानी को मजबूत करता है और एजेंसी को किसी देश के अघोषित परमाणु ठिकानों का अचानक निरीक्षण करने जैसी अतिरिक्त शक्तियां देता है. इसके बजाय, सऊदी अरब के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े सुरक्षा नियमों का फैसला दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय बातचीत के जरिए किया जा सकता है. यही वजह है कि विशेषज्ञ इस समझौते की निगरानी व्यवस्था को लेकर सवाल उठा रहे हैं.
सऊदी अरब के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंता का एक बड़ा कारण ईरान भी है. सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले कह चुके हैं कि अगर ईरान परमाणु हथियार हासिल करता है, तो उनका देश भी अपनी सुरक्षा के लिए इसी दिशा में कदम उठा सकता है. ऐसे में यदि सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन की घरेलू क्षमता मिलती है, तो पश्चिम एशिया में परमाणु प्रतिस्पर्धा को लेकर आशंकाएं बढ़ सकती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि नागरिक परमाणु कार्यक्रम और सैन्य परमाणु क्षमता के बीच अंतर बनाए रखने के लिए मजबूत निगरानी बेहद जरूरी है. First Updated : Wednesday, 22 July 2026