नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपनी ही पार्टी के कुछ नेताओं की असहमति का सामना करना पड़ा. अमेरिकी सीनेट ने एक प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जिसमें ट्रंप प्रशासन को ईरान के साथ किसी भी सैन्य संघर्ष को आगे बढ़ाने से रोकने की बात कही गई है. इस फैसले को अमेरिकी राजनीति में एक अहम संदेश के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इसमें रिपब्लिकन पार्टी के कुछ सांसदों ने भी प्रशासन के खिलाफ मतदान किया.
अमेरिकी सीनेट में यह प्रस्ताव 50 के मुकाबले 48 वोटों से पारित हुआ. दिलचस्प बात यह रही कि चार रिपब्लिकन सीनेटरों ने भी प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया. इनमें सुसान कॉलिन्स, लिसा मुर्कोव्स्की, बिल कैसिडी और रैंड पॉल शामिल रहे. वहीं, डेमोक्रेटिक पार्टी के सीनेटर जॉन फेट्टरमैन ने इस प्रस्ताव का विरोध किया. मतदान के दौरान कुछ रिपब्लिकन सांसदों की अनुपस्थिति ने भी नतीजे को प्रभावित किया और प्रस्ताव के पक्ष में माहौल मजबूत हुआ.
इससे पहले अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में भी यही प्रस्ताव पेश किया गया था, जहां इसे बहुमत के साथ पारित कर दिया गया था. वहां भी कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने पार्टी लाइन से हटकर प्रस्ताव का समर्थन किया था. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम दर्शाता है कि ईरान नीति को लेकर अमेरिकी राजनीतिक दलों के भीतर भी अलग-अलग राय मौजूद हैं.
हालांकि प्रस्ताव पारित होने के बाद इसकी काफी चर्चा हो रही है, लेकिन जानकारों का कहना है कि इसका सीधा कानूनी प्रभाव सीमित हो सकता है. एक अमेरिकी अधिकारी के अनुसार यह एक समवर्ती प्रस्ताव है, जिसे राष्ट्रपति की मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती और इसका बाध्यकारी कानूनी प्रभाव भी नहीं माना जाता. अधिकारी ने यह भी कहा कि वर्तमान में अमेरिका और ईरान के बीच सक्रिय सैन्य कार्रवाई नहीं चल रही है. ऐसे में प्रस्ताव में जिन सैन्य गतिविधियों को रोकने की बात कही गई है, वे पहले ही समाप्त हो चुकी हैं.
डेमोक्रेटिक नेताओं का कहना है कि वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि विदेश नीति और युद्ध जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर कांग्रेस की भूमिका बनी रहे. उनका मानना है कि किसी भी बड़े सैन्य अभियान को शुरू करने या जारी रखने से पहले संसद की मंजूरी आवश्यक होनी चाहिए. प्रस्ताव के समर्थकों का तर्क है कि संविधान के तहत कांग्रेस की अनुमति के बिना लंबे समय तक किसी संघर्ष को जारी रखना उचित नहीं माना जा सकता.
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से तनावपूर्ण संबंध बने हुए थे. हालांकि हाल ही में दोनों देशों ने एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिससे कई महीनों से चल रहा तनाव कम हुआ. बताया गया कि इस समझौते पर दोनों देशों के नेताओं ने डिजिटल माध्यम से सहमति जताई. समझौते का उद्देश्य क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना और आगे किसी बड़े टकराव को रोकना है.
हालांकि शांति समझौते के बावजूद ईरान का परमाणु कार्यक्रम अभी भी दोनों देशों के बीच चर्चा और विवाद का मुख्य विषय बना हुआ है. ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल ऊर्जा और अन्य शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है. दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इस कार्यक्रम पर नजर बनाए हुए हैं. उनका कहना है कि ईरान के पास मौजूद अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंता बनी हुई है. First Updated : Wednesday, 24 June 2026