नई दिल्ली : बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव से ठीक पहले हिंसा का साया गहरा गया है. मयमनसिंह जिले के त्रिशाल उपजिला में एक वृद्ध हिंदू व्यवसायी की हत्या ने अल्पसंख्यक समुदाय और राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी है. 62 वर्षीय सुसेन चंद्र सरकार सोमवार रात अपनी दुकान में मृत पाए गए. यह घटना ऐसे समय में हुई है जब देश की सत्ता के लिए मुख्य मुकाबला बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले गठबंधनों के बीच है, जो राष्ट्रीय तनाव को बढ़ा रहा है.
आपको बता दें कि मयमनसिंह जिले के त्रिशाल उपजिला के अंतर्गत आने वाले बोगर बाजार चौराहे पर स्थित 'भाई भाई एंटरप्राइज' में सोमवार रात करीब 11 बजे मौत का खौफनाक तांडव हुआ. हमलावरों ने 62 वर्षीय हिंदू व्यवसायी सुसेन चंद्र सरकार को उनकी ही दुकान के भीतर घेर लिया और बेरहमी से उनकी हत्या कर दी. हत्यारों ने कत्ल के बाद सबूत मिटाने और समय पाने के लिए दुकान का शटर बाहर से बंद कर दिया ताकि किसी को तुरंत भनक न लगे.
दरअसल, 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव के मतदान से ठीक तीन दिन पहले हुई इस घटना ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है. बांग्लादेश में इस बार बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के गठबंधन के बीच सत्ता के लिए वर्चस्व की लड़ाई बहुत ही चरम पर है. ऐसे में मतदान से ऐन पहले एक हिंदू व्यापारी को निशाना बनाने से पूरे मयमनसिंह जिले में सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक सरगर्मी काफी बढ़ गई है. प्रशासन अब हत्या के पीछे के असली मकसद की जांच कर रहा है.
मृतक सुसेन चंद्र सरकार साउथकंडा गांव के एक अत्यंत प्रतिष्ठित नागरिक और सफल चावल व्यवसायी थे. उनकी निर्मम हत्या ने स्थानीय अल्पसंख्यक समाज को भीतर तक झकझोर कर रख दिया है. पीड़ित परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है और वे प्रशासन से न्याय की गुहार लगा रहे हैं. चुनावी सरगर्मियों के बीच हुई इस वारदात से स्थानीय व्यापारी वर्ग में भी भारी खौफ का माहौल व्याप्त है. लोगों का मानना है कि मतदान से पहले सरकार को सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने चाहिए.
बता दें कि बांग्लादेश की विधायी प्रणाली को गहराई से देखें तो वहां की संसद में कुल 350 सदस्यों का संवैधानिक प्रावधान है. इसमें 300 सीटों पर सीधे आम चुनाव आयोजित किए जाते हैं, जहां नागरिक अपने मताधिकार का प्रयोग कर प्रतिनिधि चुनते हैं. शेष 50 सीटें महिलाओं के लिए विशेष रूप से आरक्षित रखी गई हैं. इन सीटों पर सीधी वोटिंग नहीं होती, बल्कि चुनाव जीतने वाली पार्टियां अपने सांसदों की संख्या के अनुपात में महिला उम्मीदवारों को मनोनीत करती हैं. यह व्यवस्था राजनीतिक स्थिरता के लिए एक अहम कदम मानी जाती है.
संसद में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की इस मनोनीत व्यवस्था का एक दूसरा और चिंताजनक पहलू यह है कि इससे महिलाएं मुख्यधारा के सीधे चुनावी संघर्षों से कट जाती हैं. नीति निर्धारण की प्रक्रिया में देश की आधी आबादी की प्रभावशाली और उचित भागीदारी आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. प्रत्यक्ष चुनाव न लड़ने के कारण महिला नेताओं का जनता से सीधा जुड़ाव काफी कम हो जाता है. इस बार के चुनाव में भी यह ज्वलंत सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या महिलाओं को सत्ता में बराबरी मिलेगी. First Updated : Tuesday, 10 February 2026