PoK इलेक्शन से पीछे हटी इमरान खान की पार्टी, चुनाव आयोग और सरकार पर लगाए गंभीर आरोप
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव से पूरी तरह दूरी बना ली है.

नई दिल्ली: पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव से पूरी तरह दूरी बना ली है. पीटीआई ने घोषणा की है कि वह 27 जुलाई को होने वाली वोटिंग में हिस्सा नहीं लेगी. मुख्य विपक्षी दल के इस औचक फैसले ने क्षेत्र के राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह से उलट दिया है. जिससे चुनावी सरगर्मियों के बीच सन्नाटा पसर गया है.
निष्पक्षता पर सवाल और बहिष्कार की वजह
पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ता द्वारा जारी एक बयान के अनुसार, पीओके में इस समय स्वतंत्र और न्यायपूर्ण चुनावी माहौल का पूरी तरह अभाव है. पीटीआई का कहना है कि मौजूदा दमनकारी और अशांत हालातों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनना मुमकिन नहीं है. प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि इस कदम का उद्देश्य कोई तात्कालिक राजनीतिक लाभ-हानि देखना नहीं है, बल्कि यह फैसला कश्मीर के स्थानीय नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और लोकतंत्र के वास्तविक सिद्धांतों का सम्मान करने के लिए लिया गया है. केंद्र में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा रखने वाली पीटीआई ने साफ कर दिया है कि जनता के अधिकारों की बहाली के बिना चुनाव का कोई नैतिक आधार नहीं है.
अवामी एक्शन कमेटी पर प्रतिबंध
इस राजनीतिक बहिष्कार के केंद्र में पीओके में लंबे समय से चल रहा एक बड़ा जन-आंदोलन है. दरअसल, 'जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAAC) बुनियादी हकूक और प्रशासनिक नीतियों के खिलाफ वहां लगातार हिंसक व शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रही है. इमरान खान की पार्टी ने इसी जमीनी आक्रोश और आंदोलन को अपने फैसले का मुख्य आधार बनाया है.
सरकार ने सख्त कदम उठाया
गौरतलब है कि पिछले कुछ महीनों से पीओके में सुरक्षा और प्रशासनिक स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है. हिंसक झड़पों और बढ़ते तनाव को देखते हुए वहां की स्थानीय सरकार ने बीते 5 जून को एक बेहद सख्त कदम उठाया था. सरकार ने आतंकवाद विरोधी कानून के तहत जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी को प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया था. इस सरकारी पाबंदी के बाद से ही पूरे इलाके में राजनीतिक और सामाजिक तनाव चरम पर पहुंच गया, जिसने विपक्ष को चुनाव से पीछे हटने पर मजबूर किया.
कमजोरी नहीं सिद्धांतों की लड़ाई
पीटीआई ने अपने आधिकारिक रुख में बार-बार दोहराया है कि चुनाव से पीछे हटने का उनका यह निर्णय किसी डर या रणनीतिक कमजोरी का परिणाम नहीं है. पार्टी नेतृत्व का मानना है कि भय और प्रतिबंधों के साये में कराए जा रहे इन चुनावों की कोई कानूनी या नैतिक प्रामाणिकता नहीं रह जाती है. अब पूरी दुनिया की नजरें 27 जुलाई को होने वाले इन चुनावों पर टिकी हैं, क्योंकि एक प्रमुख और कद्दावर राजनीतिक दल के मैदान से हटने के बाद इस चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवालिया निशान लग गए हैं.


