हर देश अपने हितों को साधने के लिए नई-नई रणनीतियां बनाता है. इसी कड़ी में रूस और ईरान ने एक अहम फैसला लिया है. रूस और ईरान ने अजरबैजान के रास्ते गैस पाइपलाइन बिछाने पर सहमति जता दी है. ये प्रोजेक्ट अब अंतिम चरण में पहुंच चुका है और फिलहाल गैस की कीमत को लेकर बातचीत चल रही है. रूसी ऊर्जा मंत्री सर्गेई त्सिविल्योव ने इस समझौते की पुष्टि करते हुए कहा कि गैस की आपूर्ति की मात्रा पहले ही तय हो चुकी है. अब कीमत को लेकर अंतिम सहमति बनाई जा रही है. विशेषज्ञ मूल्य निर्धारण के लिए अपनी रणनीति विकसित कर रहे हैं.
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पहले ही इस गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जता चुके हैं. उन्होंने बताया कि इस परियोजना के पहले चरण में 2 बिलियन क्यूबिक मीटर गैस की आपूर्ति होगी, जिसे बढ़ाकर 55 बिलियन क्यूबिक मीटर तक ले जाने की योजना है. पुतिन ने ये भी कहा कि रूस और ईरान तेल क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाने पर चर्चा कर रहे हैं. इस सिलसिले में 2024 के अंत में रूसी कंपनी गज़प्रोम और ईरान की सरकारी गैस कंपनी के बीच एक समझौता हुआ था.
इस समझौते के तहत, कैस्पियन सागर के माध्यम से रूस से ईरान को प्रतिदिन 300 मिलियन क्यूबिक मीटर गैस आपूर्ति की जाएगी. इसके अलावा, ईरान अपनी जरूरत से बची गैस को अन्य देशों को बेचने के लिए स्वतंत्र होगा. इस गैस पाइपलाइन समझौते की अवधि 30 साल तय की गई है और इससे ईरान को सालाना 10-12 बिलियन डॉलर की आमदनी होगी.
अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान गंभीर ऊर्जा संकट से जूझ रहा है. दुनिया के दूसरे सबसे बड़े गैस भंडार के बावजूद ईरान को घरेलू और औद्योगिक क्षेत्र में भारी गैस कमी का सामना करना पड़ रहा है. पिछले साल सर्दियों में ईरान को 90 मिलियन क्यूबिक मीटर गैस की कमी झेलनी पड़ी थी. इस साल यह आंकड़ा बढ़कर 300 मिलियन क्यूबिक मीटर तक पहुंचने की संभावना है. गैस उत्पादन की वृद्धि दर भी पिछले दशक के 5% से घटकर महज 2% रह गई है. ईरान को अपने ऊर्जा सेक्टर में सुधार के लिए कम से कम 250 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत है. प्रतिबंधों के कारण ईरान एडवांस टेक्नोलॉजी और संसाधनों तक नहीं पहुंच पा रहा, जिससे उसका ऊर्जा संकट और गहराता जा रहा है.
ईरानी अधिकारियों को उम्मीद है कि रूसी गैस खरीदने के बाद वे इसे पाकिस्तान, तुर्की और इराक जैसे देशों को बेच सकेंगे. इससे ईरान को क्षेत्रीय गैस हब के रूप में स्थापित करने का मौका मिलेगा. रूस और ईरान का यह समझौता जियो-पॉलिटिकल रणनीति का अहम हिस्सा है. इस प्रोजेक्ट का मकसद एक वैकल्पिक ऊर्जा गलियारा तैयार करना और ब्रिक्स (BRICS) तथा शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे प्लेटफॉर्म पर इसे आगे बढ़ाना है.
रूस और ईरान इस समझौते के जरिए पश्चिमी देशों के ऊर्जा वर्चस्व को तोड़ना चाहते हैं. दोनों देश स्थानीय मुद्रा में व्यापार बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं, जिससे अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम की जा सके. शिया बहुल देश होने के बावजूद अजरबैजान के इजरायल के साथ मजबूत संबंध हैं, जबकि ईसाई बाहुल्य देश आर्मीनिया के ईरान से गहरे रिश्ते हैं. नागोर्नो-काराबाख युद्ध के दौरान ईरान ने आधिकारिक रूप से तटस्थ रुख अपनाया था, लेकिन वास्तव में उसने आर्मीनिया का समर्थन किया था. First Updated : Friday, 07 February 2025