जिस देश से ईरान ने 8 साल तक लड़ा था खूनी युद्ध, उसी इराक में ले जाया जाएगा अली खामेनेई का शव

ईरान अपने इस सर्वोच्च नेता की अंतिम विदाई को न केवल मुस्लिम दुनिया, विशेषकर शिया समुदाय की एकजुटता का जरिया बना रहा है, बल्कि इसे एक बड़े क्षेत्रीय शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी इस्तेमाल कर रहा है.

Nidhi Jha
Edited By: Nidhi Jha

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में कभी-कभी ऐसे ऐतिहासिक मोड़ आते हैं, जो दशकों पुराने संघर्षों और दुश्मनी की दीवारों को ढहा देते हैं. ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद उपजी परिस्थितियां कुछ ऐसा ही अनोखा और अप्रत्याशित दृश्य रच रही हैं. ईरान अपने इस सर्वोच्च नेता की अंतिम विदाई को न केवल मुस्लिम दुनिया, विशेषकर शिया समुदाय की एकजुटता का जरिया बना रहा है, बल्कि इसे एक बड़े क्षेत्रीय शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी इस्तेमाल कर रहा है.

अली खामेनेई की अंतिम यात्रा

इस सिलसिले में सबसे चौंकाने वाली तस्वीर बुधवार, 8 जुलाई को देखने को मिलेगी, जब अली खामेनेई का शव ईरान की सरहदों को पार कर पड़ोसी देश इराक की धरती पर पहुंचेगा. यह वही इराक है, जिसके साथ ईरान ने आठ वर्षों (1980 से 1988) तक एक बेहद खूनी और विनाशकारी युद्ध लड़ा था. उस खूनी संघर्ष में दोनों ओर के लाखों लोगों ने अपनी जान गंवाई थी और पीढ़ियां इसकी कीमत चुकाती रहीं. लेकिन आज इतिहास के उस कड़वे सच पर वर्तमान की रणनीतिक हकीकत पूरी तरह हावी हो चुकी है.

धार्मिक नगरों में अंतिम रस्में और क्षेत्रीय संदेश

अंतिम संस्कार के तय कार्यक्रम के अनुसार, मंगलवार यानी 7 जुलाई को खामेनेई के पार्थिव शरीर को ईरान के प्रमुख धार्मिक और शिया शिक्षा के केंद्र 'कोम' शहर ले जाया जाएगा, जहां विशेष मजहबी रस्में अदा की जाएंगी. इसके अगले दिन यानी 8 जुलाई को उनका शव इराक के बेहद पवित्र शिया शहरों, नजफ और कर्बला पहुंचेगा. इन दोनों शहरों में होने वाले आयोजनों में ईरान के क्षेत्रीय शिया प्रॉक्सी नेटवर्क के तमाम बड़े दिग्गजों और प्रमुख चेहरों के शामिल होने की उम्मीद है, जो पश्चिम एशिया में ईरान के बढ़ते रसूख और प्रभाव को साफ तौर पर प्रदर्शित करेगा.

क्या था 1980 के ऐतिहासिक युद्ध का कारण?

यदि इतिहास के पन्नों को पलटें, तो साल 1979 में ईरान में हुई इस्लामी क्रांति के बाद वहां की कमान पहले सुप्रीम लीडर रुहोल्लाह खामेनेई के हाथों में आई थी. इस क्रांति से घबराकर इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने 1980 में ईरान पर हमला बोल दिया था. सद्दाम हुसैन को डर था कि ईरान की शिया क्रांति की चिंगारी इराक के शिया बहुल इलाकों में फैलकर उनकी सत्ता को अस्थिर कर सकती है. इसके अलावा दोनों देशों के बीच 'शत्त-अल-अरब' जलमार्ग और सीमा विवाद भी इस विनाशकारी युद्ध की बड़ी वजह बना. युद्ध के शुरुआती दौर में ईरान के पहले निर्वाचित राष्ट्रपति अब्दुल हसन (जिन्होंने फरवरी 1980 में पद संभाला था) सेना के कमांडर-इन-चीफ थे, लेकिन 1981 में खामेनेई से मतभेदों के बाद उन्हें पद से हटा दिया गया और वे फ्रांस चले गए.

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