ट्रंप प्रशासन ने शुरू की H-1B वीज़ा धोखाधड़ी की पहली बड़ी जांच, कॉग्निज़ेंट का नाम आया सामने
H-1B वीज़ा एक नॉन-इमिग्रेंट वर्क परमिट है। US कंपनियां इसके जरिए खास स्किल वाले विदेशी प्रोफेशनल्स को हायर करती हैं। ये आमतौर पर 3 साल के लिए मिलता है और 6 साल तक बढ़ाया जा सकता है।

नई दिल्ली: डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने H-1B और PERM वर्क वीज़ा से जुड़ी धोखाधड़ी पर अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। US लेबर डिपार्टमेंट के इंस्पेक्टर जनरल एंथनी डी'एस्पोसिटो ने कहा कि जांचकर्ताओं ने पहले ही दर्जनों समन जारी कर दिए हैं। इस दौरान उन्होंने IT कंपनी कॉग्निज़ेंट का नाम भी लिया।
क्या है पूरा मामला?
H-1B वीज़ा एक नॉन-इमिग्रेंट वर्क परमिट है। US कंपनियां इसके जरिए खास स्किल वाले विदेशी प्रोफेशनल्स को हायर करती हैं। ये आमतौर पर 3 साल के लिए मिलता है और 6 साल तक बढ़ाया जा सकता है। PERM एक लेबर सर्टिफिकेशन प्रोसेस है जिसे कंपनियों को परमानेंट रेजिडेंसी स्पॉन्सर करने से पहले पूरा करना होता है। डी'एस्पोसिटो ने FOX Business को बताया कि व्हिसलब्लोअर्स ने कॉग्निज़ेंट जैसी कुछ बड़ी कंपनियों के बारे में जानकारी दी है।
उन्होंने कहा, "हम प्रेसिडेंट और वाइस प्रेसिडेंट की धोखाधड़ी टास्क फोर्स के साथ मिलकर हर सुराग की जांच करेंगे।" हालांकि उन्होंने कॉग्निज़ेंट पर कोई औपचारिक आरोप नहीं लगाया। ये ऐलान मिल्वौकी में वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस के एक इवेंट से पहले हुआ, जहां प्रशासन धोखाधड़ी और संगठित अपराध के खिलाफ अपने अभियान को बताएगा।
वीज़ा धोखाधड़ी को संगठित अपराध से जोड़ा
डी'एस्पोसिटो ने कहा कि ये सिर्फ इमिग्रेशन नियम तोड़ने का मामला नहीं है। उनके मुताबिक विदेशी लेबर का शोषण और मानव तस्करी अब कार्टेल और अंतरराष्ट्रीय गैंग्स से जुड़ रही है।
उन्होंने कहा, "हम विदेशी लेबर के मामलों में जो वीज़ा और मानव तस्करी देखते हैं, उसका ज्यादातर हिस्सा कार्टेल और अंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल संगठनों से जुड़ा है। ये धोखाधड़ी हिंसक अपराध को भी बढ़ावा दे रही है।" व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी ने भी X पर इसकी पुष्टि की और लिखा कि ट्रंप प्रशासन ने H-1B वीज़ा धोखाधड़ी की पहली बड़ी जांच शुरू की है।
टेक इंडस्ट्री और भारत पर असर
टेक्नोलॉजी सेक्टर H-1B का सबसे बड़ा यूजर है। पिछले सालों में नए आवेदनों में टेक कंपनियों की हिस्सेदारी 60 से 70 प्रतिशत रही है। इसके अलावा कंसल्टिंग फर्म, इंजीनियरिंग, हेल्थकेयर और यूनिवर्सिटीज भी इस वीज़ा का इस्तेमाल करती हैं।
भारत के लिए ये जांच खास अहम है। FY 2024 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक H-1B वीज़ा पाने वालों में करीब 71 प्रतिशत भारतीय थे। यानी अमेरिका में H-1B धारकों में सबसे बड़ा समूह भारतीय नागरिकों का है। हजारों भारतीय इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर्स और AI प्रोफेशनल्स इसी वीज़ा के जरिए US में काम करते हैं। भारतीय IT कंपनियां भी इस प्रोग्राम की बड़ी यूजर रही हैं।
हालांकि पिछले महीने एक फेडरल जज ने प्रशासन के उस नियम को रद्द कर दिया था जिसमें H-1B आवेदन पर $100,000 फीस लगानी थी। कोर्ट ने कहा था कि कांग्रेस की मंजूरी के बिना ये फीस नहीं लगाई जा सकती।


