अमेरिका की मौजूदगी में इजरायल-लेबनान के बीच हुआ समझौता, हिजबुल्लाह ने दी गृहयुद्ध की चेतावनी

अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल और लेबनान के बीच अहम समझौता हुआ है, लेकिन हिजबुल्लाह ने इसे मानने से इनकार कर दिया. हिजबुल्लाह का कहना है कि अगर ये समझौते उसकी सहमति के बिना लागू किया गया तो लेबनान में गंभीर आंतरिक संकट पैदा हो सकता है.

Shraddha Mishra

नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में लंबे समय से जारी संघर्ष के बीच अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल और लेबनान ने एक फ्रेमवर्क एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. हालांकि इस समझौते से हिजबुल्लाह को बाहर रखा गया है, जिसके चलते संगठन ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया है. हिजबुल्लाह का कहना है कि अगर इस समझौते को उसकी सहमति के बिना लागू किया गया तो इससे लेबनान में गंभीर आंतरिक संकट पैदा हो सकता है.

अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, इस समझौते का मुख्य उद्देश्य दक्षिणी लेबनान में स्थिरता बहाल करना और लंबे समय से जारी सैन्य तनाव को कम करना है. इसके तहत हिजबुल्लाह के हथियारबंद ढांचे को खत्म करने की योजना बनाई गई है. साथ ही दक्षिणी लेबनान से इजरायली सेना की चरणबद्ध वापसी और पूरे क्षेत्र में लेबनानी सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण को मजबूत करने की प्रक्रिया भी तय की गई है. अमेरिका ने इस समझौते के क्रियान्वयन के लिए 'मिलिट्री कोऑर्डिनेशन ग्रुप फॉर लेबनान' नाम का एक विशेष तंत्र बनाने की घोषणा की है. इसके अलावा लेबनान के मानवीय सहायता कार्यक्रमों के लिए 10 करोड़ डॉलर की आर्थिक मदद देने का भी ऐलान किया गया है.

समझौते पर इजरायल और लेबनान का क्या कहना है?

वॉशिंगटन में आयोजित कार्यक्रम के दौरान अमेरिका में इजरायल के राजदूत येचिएल लेइटर और लेबनान की राजदूत नादा हमादेह मोआवद ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए. इजरायली प्रतिनिधि ने कहा कि यह समझौता दोनों देशों के बीच स्थायी शांति की दिशा में एक मजबूत शुरुआत है. उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में दोनों देशों के नागरिक बिना किसी डर के एक-दूसरे के यहां यात्रा कर सकेंगे. हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि यह तभी संभव होगा जब हिजबुल्लाह पूरी तरह हथियार छोड़ देगा. वहीं लेबनान की ओर से कहा गया कि यह समझौता देश की संप्रभुता मजबूत करने, विस्थापित लोगों की वापसी सुनिश्चित करने और सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति स्थापित करने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकता है.

हिजबुल्लाह ने किया समझौते का विरोध

इस समझौते के सामने सबसे बड़ी चुनौती हिजबुल्लाह का विरोध है. संगठन ने साफ कर दिया है कि वह अपने हथियार नहीं छोड़ेगा. हिजबुल्लाह के सांसद हसन फदलल्लाह ने कहा कि अमेरिका के समर्थन से ऐसा समझौता थोपने की कोशिश की जा रही है, जिससे देश के भीतर टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यदि लेबनानी सरकार इस समझौते को लागू करने की कोशिश करती है तो उसे अपने ही लोगों के विरोध का सामना करना पड़ सकता है.

कैसे शुरू हुआ मौजूदा संघर्ष?

हाल के महीनों में क्षेत्र में तनाव तब और बढ़ गया, जब इजरायल और अमेरिका की सैन्य कार्रवाई के बाद हिजबुल्लाह ने उत्तरी इजरायल पर रॉकेट दागे. इसके जवाब में इजरायल ने दक्षिणी लेबनान में सैन्य अभियान तेज कर दिया. मार्च से अब तक हुए हमलों में लेबनान में हजारों लोगों की जान जा चुकी है, जबकि इजरायल को भी सैन्य नुकसान उठाना पड़ा है. लगातार जारी इस संघर्ष ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता को प्रभावित किया है.

इजरायली सेना की वापसी की क्या है योजना?

समझौते के तहत दक्षिणी लेबनान में कुछ पायलट जोन बनाए जाएंगे. सबसे पहले इन क्षेत्रों में लेबनानी सेना की तैनाती होगी और उसके बाद चरणबद्ध तरीके से इजरायली सेना पीछे हटेगी. हालांकि इजरायल ने स्पष्ट किया है कि जब तक हिजबुल्लाह पूरी तरह निरस्त्र नहीं हो जाता, तब तक सीमावर्ती इलाकों की सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं किया जाएगा.

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस समझौते को अपने देश की बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया है. दूसरी ओर लेबनान ने भी इसे शांति बहाल करने की दिशा में सकारात्मक पहल माना है. हालांकि हिजबुल्लाह के कड़े विरोध ने इस समझौते के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

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