नई दिल्ली: हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य का दर्जा प्राप्त है. किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणपति वंदना के बिना अधूरी मानी जाती है. साल भर में भगवान गणेश से जुड़े कई पर्व मनाए जाते हैं, लेकिन गणेश चतुर्थी और गणेश जयंती सबसे अधिक प्रचलित और महत्वपूर्ण माने जाते हैं. अक्सर श्रद्धालु इन दोनों तिथियों को लेकर भ्रम में रहते हैं.
पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में 22 जनवरी को गणेश जयंती मनाई जाएगी. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि गणेश चतुर्थी और गणेश जयंती में मूल अंतर क्या है और इन अवसरों पर पूजा करते समय किन नियमों का पालन करना चाहिए.
हालांकि दोनों पर्व भगवान गणेश को समर्पित हैं, लेकिन इनकी धार्मिक मान्यताएं और उद्देश्य अलग-अलग हैं.
गणेश चतुर्थी (भाद्रपद मास)
गणेश चतुर्थी का पर्व भाद्रपद मास में आता है, जो आमतौर पर अगस्त या सितंबर में पड़ता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान गणेश कैलाश से धरती पर अपने भक्तों के बीच पधारते हैं. इसे गणेश जी के आगमन का उत्सव माना जाता है, जो कई स्थानों पर 10 दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है.
गणेश जयंती (माघ मास)
गणेश जयंती को माघ विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है. यह माघ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है. मान्यता है कि इसी दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था, इसलिए इसे उनके जन्मोत्सव के रूप में पूजा जाता है.
गणेश जयंती की पूजा विधि सरल लेकिन नियमों के साथ की जाती है.
भगवान गणेश की पूजा के लिए दोपहर का समय सबसे शुभ माना गया है.
पूजा में धूप, दीप, गंध, लाल पुष्प और लाल वस्त्रों का प्रयोग करें. भगवान गणेश को मोदक का भोग लगाएं और दुर्वा घास अवश्य अर्पित करें, क्योंकि यह उन्हें अत्यंत प्रिय है.
पूजा के दौरान श्रद्धा भाव से
"ॐ गं गणपतये नमः"
या अन्य गणेश मंत्रों का जाप करें.
कई घरों में इस दिन कलश स्थापना की जाती है, जिसे शुद्धता और मंगल का प्रतीक माना जाता है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गणेश जयंती के दिन चंद्रमा के दर्शन करना अशुभ माना जाता है. कहा जाता है कि इस दिन चांद देखने से व्यक्ति पर झूठा कलंक या दोष लग सकता है. यदि भूलवश चंद्र दर्शन हो जाए, तो तुरंत भगवान गणेश की पूजा कर उनसे क्षमा प्रार्थना करनी चाहिए.
भाद्रपद मास की गणेश चतुर्थी पर जहां भगवान गणेश की प्रतिमा 10 दिनों तक स्थापित कर अनंत चतुर्दशी को विसर्जन किया जाता है, वहीं गणेश जयंती पर कई श्रद्धालु एक दिन का उपवास रखते हैं. शाम को पूजा के बाद व्रत का पारण किया जाता है. कुछ क्षेत्रों में इस दिन भी प्रतिमा स्थापना और विसर्जन की परंपरा निभाई जाती है. First Updated : Wednesday, 21 January 2026