युद्ध से कच्चे तेल की कीमतों में आग...लेकिन चीन को 31 मार्च का इंतजार, जानें क्या है इसके पीछे का कारण ?
दुनिया में कच्चे तेल की कीमतें अचानक 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं. पिछले एक महीने में 56 प्रतिशत उछाल के बावजूद दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक चीन पूरी तरह चुप है. इसके पीछे विशाल रणनीतिक भंडार, सस्ते सौदे और कूटनीतिक चालाकी है.

नई दिल्ली : दुनिया भर में कोहराम मचा हुआ है, युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहे, कच्चा तेल उबल पड़ा है. पिछले हफ्ते तक ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल तक जाने की बात हो रही थी, लेकिन अचानक 110 डॉलर का आंकड़ा छू लिया. किसी को इसकी उम्मीद नहीं थी. यह डर अब हकीकत बन गया है. तेल आयात करने वाले देशों में चीन सबसे आगे है, उसके बाद भारत. फिर भी चीन की तरफ से कोई बड़ी प्रतिक्रिया नहीं आई. एक महीने में 56 फीसदी उछाल के बाद भी कीमत 108 डॉलर के आसपास बनी हुई है.
चीन के पास विशाल तेल भंडार
आपको बता दें कि चीन ने पिछले सालों में कच्चे तेल का भंडार लगातार बढ़ाया है. अनुमान है कि उसके पास 900 मिलियन बैरल यानी 90 करोड़ बैरल का रणनीतिक स्टॉक है. यह स्टॉक उसकी 90 से 120 दिनों की आयात जरूरत को पूरा कर सकता है. चीन रोज 15-16 मिलियन बैरल तेल खपत करता है और खुद 4 मिलियन बैरल निकालता है. यानी उसके पास करीब 4 महीने का तेल सुरक्षित है, जबकि भारत के पास सिर्फ 45-50 दिन का. ऐसे में अचानक कीमत बढ़ने से चीन घबराता नहीं है.
रूस और ईरान से सस्ता तेल
दरअसल, चीन अभी भी रूस और ईरान से काफी सस्ते दाम पर तेल खरीद रहा है. पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद यह आयात जारी है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें भले ही आसमान छू रही हों, चीन पर उनका असर बहुत कम पड़ रहा है. सस्ते सौदों से उसकी लागत नियंत्रित बनी हुई है और वह बिना घबराए स्थिति का सामना कर रहा है.
मिडिल ईस्ट के साथ लंबे समझौते
चीन ने सउदी अरब और यूएई जैसे तेल उत्पादक देशों के साथ लंबी अवधि के समझौते कर रखे हैं. इनमें कीमतें स्पॉट मार्केट से कम उतार-चढ़ाव वाली हैं. अगर कीमतें बहुत बढ़ जाएं तो चीन आयात कम करके अपने स्टॉक का इस्तेमाल कर सकता है. इससे बाजार में अस्थिरता नहीं फैलती और आपूर्ति सुरक्षित रहती है.
अंतरराष्ट्रीय संकटों में सार्वजनिक बयान देने से बचता...
चीन अंतरराष्ट्रीय संकटों में सार्वजनिक बयान देने से बचता है. वह पर्दे के पीछे कूटनीतिक बातचीत और आर्थिक रणनीति पर ध्यान देता है. तेल पर निर्भरता घटाने के लिए उसने कोयला, गैस, परमाणु ऊर्जा और हरित ऊर्जा में भारी निवेश किया है. इसलिए तेल की महंगाई का असर उसकी पूरी अर्थव्यवस्था पर सीमित रहता है.
ट्रंप की चीन यात्रा का इंतजार
अमेरिका और चीन के बीच बातचीत चल रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 31 मार्च से 2 अप्रैल 2026 तक चीन जाएंगे. बीजिंग में उनकी शी जिनपिंग से मुलाकात होगी. यह ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की पहली चीन यात्रा है. इस मौके से पहले चीन कोई विवाद नहीं चाहता. व्यापार तनाव, टैरिफ और तेल खरीद जैसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है. खबर है कि चीन 500 विमान खरीदने का बड़ा सौदा भी कर सकता है.
चीन रोज कितना तेल खरीदता है
साल 2025 में चीन ने 557.7 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया. यह औसतन 11.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन के बराबर है. 2024 में यह 11.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन था. हाल के महीनों में आयात 12-13 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया. दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा अकेला चीन खरीदता है. फिर भी दाम बढ़ने पर वह चुप है.


