मुंबई: मशहूर गीतकार और लेखक जावेद अख्तर अपनी दोटूक राय और तर्कपूर्ण बातों के लिए हमेशा चर्चा में रहते हैं. हाल ही में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के एक सत्र के दौरान उन्होंने भाषा, परिवार, धर्मनिरपेक्षता और सिनेमा के बदलते स्वरूप पर खुलकर अपने विचार रखे. इस संवाद में उन्होंने दर्शकों के तीखे सवालों के जवाब दिए और अपने निजी जीवन के अनुभव भी साझा किए.
सत्र के दौरान जावेद अख्तर ने अपने बचपन की यादों को ताजा करते हुए बताया कि उनके व्यक्तित्व और सोच पर उनकी मां और दादी का गहरा असर रहा है. बातचीत के क्रम में उन्होंने संस्कृत और उर्दू जैसी भाषाओं पर भी अपनी स्पष्ट राय रखी, जिसने श्रोताओं का खासा ध्यान खींचा.
फेस्टिवल में जब एक दर्शक ने पूछा कि उर्दू और संस्कृत में से कौन सी भाषा ज्यादा पुरानी है, तो जावेद अख्तर ने बिना किसी लाग-लपेट के जवाब दिया कि यह कैसा सवाल है? संस्कृत दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी जीवित भाषा है, जबकि उर्दू तो अभी हजार साल पुरानी भी नहीं है. उर्दू असल में संस्कृत की छोटी बहन जैसी है.
उन्होंने आगे बताया कि तमिल को दुनिया की सबसे पुरानी जीवित भाषा माना जाता है और उसके बाद संस्कृत का स्थान आता है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि भाषाओं की अहमियत उनकी उम्र से नहीं, बल्कि उनके सांस्कृतिक और सामाजिक योगदान से तय होनी चाहिए.
बातचीत के दौरान जावेद अख्तर भावुक भी हो गए. उन्होंने बताया कि उनकी मां का निधन उनके आठवें जन्मदिन के ठीक अगले दिन हो गया था. उन्होंने कहा कि मेरी मां ने ही भाषा को मेरे लिए एक मजेदार अनुभव बनाया. वे मुझे नए शब्द और उनके अर्थ सिखाती थीं. आज भी जब मैं कोई स्क्रिप्ट लिखता हूं, तो मेरे दिमाग में वो बातें आती हैं जो मैंने छह-सात साल की उम्र में अपनी मां से या उनके उपन्यासों से सीखी थीं.
अकादमिक प्रतिस्पर्धा और तुलना से परेशान एक युवा के सवाल पर जावेद अख्तर ने जीवन का अहम सबक दिया. उन्होंने कहा कि किसी की विरासत या प्रतिभा से डरने की बजाय उसकी कद्र करनी चाहिए. डरने का मतलब है कि आप खुद की तुलना दूसरे से कर रहे हैं. याद रखिए हमेशा कोई न कोई आपसे बेहतर होगा और आप किसी और से बेहतर होंगे. इसलिए आपकी असली प्रतियोगिता खुद से होनी चाहिए.
धर्मनिरपेक्षता को लेकर जावेद अख्तर ने इसे किसी उपदेश से नहीं, बल्कि व्यवहार से सीखने वाली चीज बताया. उन्होंने कहा कि यह कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे लेक्चर देकर सिखाया जा सके. यह एक जीवनशैली है जो आप अपने बड़ों को देखकर सीखते हैं. उन्होंने अपने बचपन का एक किस्सा साझा करते हुए बताया कि कैसे उनकी दादी ने उनके दादाजी को उन्हें धार्मिक छंद याद कराने के बदले पैसे देने से मना कर दिया था. अख्तर ने कहा कि वह मेरी धार्मिक शिक्षा का अंत था. मेरी दादी पढ़ी-लिखी नहीं थीं, अपना नाम तक नहीं लिख सकती थीं, लेकिन उनमें यह गहरी समझ थी.
सिनेमा के बदलते दौर पर टिप्पणी करते हुए जावेद अख्तर ने कहा कि आज का बॉलीवुड उनके शुरुआती समय से काफी अलग हो चुका है. उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि आज के असिस्टेंट डायरेक्टर हीरो को उसके नाम से बुलाते हैं, हमारे दौर में इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.
उन्होंने इन बदलावों को सकारात्मक बताते हुए यह भी कहा कि सिनेमा हमेशा समाज के मूल्यों और सोच को प्रतिबिंबित करता है. First Updated : Saturday, 17 January 2026