पटना : बिहार की राजनीति में पिछले दो दशकों से सत्ता के केंद्र बिंदु रहे नीतीश कुमार अब दिल्ली का रुख कर सकते हैं. पटना में यह चर्चा जोरों पर है कि जेडीयू अध्यक्ष को मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए राजी किया जा रहा है. ताकि भाजपा को अपना पहला मुख्यमंत्री नियुक्त करने का अवसर मिल सके. होली के बीच आई इस खबर ने एनडीए के सहयोगियों और प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है. यह बदलाव बिहार की राजनीति के भविष्य के लिए एक नई दिशा तय करेगा.
आपको बता दें कि अगर नीतीश कुमार राज्यसभा जाने के प्रस्ताव पर राजी हो जाते हैं. तो वे गुरुवार को ही अपना नामांकन दाखिल कर सकते हैं. अप्रैल में पुराने सदस्यों का कार्यकाल पूरा होने के बाद नए सांसदों की शपथ होगी. इससे पहले ही बिहार में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण का रास्ता साफ हो जाएगा. यह बदलाव बिहार की राजनीति में एक ऐतिहासिक घटना होगी. क्योंकि भाजपा ने अब तक राज्य में कभी भी किसी गठबंधन सरकार का स्वतंत्र रूप से नेतृत्व नहीं किया है और वे लंबे समय से इस मौके की तलाश में थे.
नीतीश कुमार के हटने के बाद केवल मुख्यमंत्री ही नहीं, बल्कि पूरे मंत्रिमंडल की रूपरेखा बदल जाएगी. सूत्रों का मानना है कि यदि भाजपा का मुख्यमंत्री बनता है, तो मंत्रिमंडल में जेडीयू के मंत्रियों की संख्या भाजपा से अधिक हो सकती है. वर्तमान में भाजपा के पास जो दो उपमुख्यमंत्री पद हैं. वे जेडीयू के कोटे में जा सकते हैं. यह व्यवस्था दोनों दलों के बीच शक्ति संतुलन को बनाए रखने के लिए की जा सकती है. ताकि गठबंधन में किसी भी प्रकार का मतभेद न उभरे और सरकार सुचारू रूप से चलती रहे.
सबसे चौंकाने वाली चर्चा नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को लेकर है. पहले उन्हें हरिवंश नारायण सिंह की जगह राज्यसभा भेजने की चर्चा थी. लेकिन अब माना जा रहा है कि वे जेडीयू कोटे से बिहार के उपमुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं. निशांत की सक्रिय राजनीति में एंट्री जेडीयू के भविष्य और उत्तराधिकार के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है. भाजपा को भी कई बड़े मंत्रालय जेडीयू के लिए छोड़ने पड़ेंगे. जो अब तक नीतीश कैबिनेट में हमेशा से भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के पास सुरक्षित हुआ करते थे.
भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के लिए कई नामों पर मंथन चल रहा है. जिसमें केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सबसे आगे हैं. भाजपा की योजना राज्य में किसी ओबीसी या अति पिछड़ी जाति के चेहरे को मुख्यमंत्री बनाने की है. नित्यानंद राय लंबे समय से भाजपा की उस रणनीति का हिस्सा रहे हैं. जिसके तहत बिहार में पहला भगवा मुख्यमंत्री बनाया जा सके. सम्राट चौधरी के बढ़ते राजनीतिक कद और लगातार प्रमोशन ने भी उनकी दावेदारी को पार्टी और गठबंधन में और अधिक मजबूत कर दिया है.
सत्ता के इस बड़े बदलाव का असर केवल मंत्रियों तक सीमित नहीं रहेगा. बल्कि इसका प्रभाव निगमों. बोर्डों और पूरी नौकरशाही पर भी स्पष्ट रूप से दिखेगा. चिराग पासवान, जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा जैसे सहयोगी दल भी इस बदलते राजनीतिक मौसम पर अपनी बारीक नजर बनाए हुए हैं. मुख्यमंत्री बदलने के साथ ही राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में व्यापक फेरबदल की संभावना जताई जा रही है. आने वाले कुछ ही हफ़्तों में बिहार की पूरी राजनीतिक तस्वीर अब पूरी तरह से बदली हुई नजर आ सकती है. First Updated : Wednesday, 04 March 2026