Explainer: कॉपी बच्चों ने लिखी, लेकिन भविष्य एक डिजिटल सिस्टम के हवाले हो गया!

  CBSE के ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम को लेकर इस बार ऐसा विवाद खड़ा हुआ, जिसने लाखों छात्रों और अभिभावकों का भरोसा हिला दिया. नंबरों में गड़बड़ी, रीचेकिंग की शिकायतें और मानसिक दबाव के बीच अब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को खुद सामने आकर जवाब देना पड़ा है. सवाल उठ रहा है कि क्या डिजिटल सिस्टम छात्रों का भविष्य सुरक्षित बना रहा है या फिर उसे और उलझा रहा है?

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

नई दिल्ली: जिस तकनीक को शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और तेजी लाने के लिए लागू किया गया था, वही अब लाखों छात्रों के लिए परेशानी का कारण बनती दिखाई दे रही है. CBSE के ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम यानी OSM को लेकर देशभर में सवाल खड़े हो गए हैं. छात्रों का आरोप है कि उनकी मेहनत का सही मूल्यांकन नहीं हुआ. कई जगह नंबरों में गड़बड़ी की शिकायतें सामने आईं, तो कहीं छात्रों ने दावा किया कि उम्मीद से बेहद कम अंक दिए गए. सोशल मीडिया पर छात्रों और अभिभावकों का गुस्सा फूट पड़ा.

मामला इतना बढ़ गया कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को खुद सामने आकर बयान देना पड़ा. उन्होंने कहा कि जो भी गड़बड़ियां हुई हैं, उनकी जिम्मेदारी से सरकार पीछे नहीं हटेगी. अब यह विवाद सिर्फ रिजल्ट तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में टेक्नोलॉजी पर भरोसे का बड़ा सवाल बन गया है.

ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम आखिर है क्या?

CBSE ने पिछले कुछ वर्षों में कॉपियों की जांच प्रक्रिया को डिजिटल बनाने के लिए ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम लागू किया था. इस सिस्टम के तहत छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन करके डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया जाता है. इसके बाद परीक्षक कंप्यूटर स्क्रीन पर बैठकर कॉपियों की जांच करते हैं और नंबर सीधे सिस्टम में फीड किए जाते हैं. बोर्ड का दावा था कि इससे कॉपियों की जांच में पारदर्शिता आएगी, मानवीय गलतियां कम होंगी और रिजल्ट जल्दी जारी किए जा सकेंगे.

बोर्ड का यह भी कहना था कि डिजिटल रिकॉर्ड रहने से हर कॉपी की निगरानी आसान हो जाएगी. इससे कॉपियों के खोने या नंबर गलत चढ़ने जैसी शिकायतों पर रोक लगेगी. CBSE ने इसे शिक्षा व्यवस्था में आधुनिक बदलाव की दिशा में बड़ा कदम बताया था.

कॉपियों से स्क्रीन तक विवाद

पहले परीक्षक हाथ से कॉपियां जांचते थे और नंबर मैन्युअली जोड़े जाते थे. कई बार टोटलिंग में गलती या नंबर चढ़ाने में गड़बड़ी हो जाती थी. इसी को खत्म करने के लिए डिजिटल सिस्टम लाया गया. लेकिन इस बार कई छात्रों ने आरोप लगाया कि स्क्रीन पर कॉपियां सही तरीके से नहीं खुलीं, कुछ पेज गायब थे या नंबरों की एंट्री में तकनीकी दिक्कत हुई

यही वजह है कि अब वही सिस्टम विवादों के घेरे में आ गया है जिसे भविष्य का मॉडल बताया जा रहा था. कुछ छात्रों का दावा है कि कॉपियों के स्कैन धुंधले दिखाई दे रहे थे, जिससे उत्तर स्पष्ट नहीं पढ़े जा सके. वहीं कुछ शिक्षकों ने भी माना कि लगातार स्क्रीन पर कॉपी जांचना थकान बढ़ाता है. इसी वजह से अब डिजिटल मूल्यांकन की विश्वसनीयता पर नए सवाल खड़े हो गए हैं.

छात्रों को क्या-क्या परेशानी हुई?

सबसे ज्यादा शिकायत नंबर कम आने को लेकर हुई. कई ऐसे छात्र सामने आए जिन्होंने स्कूल और प्री-बोर्ड परीक्षाओं में शानदार प्रदर्शन किया था, लेकिन बोर्ड रिजल्ट में उन्हें उम्मीद से बेहद कम अंक मिले. कुछ छात्रों ने दावा किया कि जिन विषयों में उन्हें हमेशा अच्छे नंबर मिलते थे, उसी में अचानक बेहद खराब अंक आए. कई छात्रों ने कहा कि उनके करियर की दिशा ही बदल गई क्योंकि अच्छे कॉलेजों में एडमिशन कटऑफ के कारण मुश्किल हो गया. कुछ छात्रों को अपनी मेहनत बेकार जाती हुई महसूस हुई. अभिभावकों ने भी कहा कि बच्चों का आत्मविश्वास इस विवाद से बुरी तरह प्रभावित हुआ है.

सिस्टम पर टूटा छात्रों का भरोसा

रीचेकिंग के लिए आवेदन करने वालों की संख्या भी इस बार तेजी से बढ़ी. कई छात्रों और अभिभावकों का कहना था कि उन्हें बच्चों की मेहनत पर भरोसा है, लेकिन सिस्टम पर भरोसा टूट गया है. कुछ मामलों में छात्रों ने यह भी आरोप लगाया कि कॉपी के पूरे उत्तर चेक ही नहीं किए गए. री-इवैल्यूएशन पोर्टल पर अचानक बढ़े ट्रैफिक के कारण तकनीकी दिक्कतें भी सामने आईं. कई छात्रों को शिकायत दर्ज करने में परेशानी हुई. इससे गुस्सा और ज्यादा बढ़ गया क्योंकि छात्रों को लगा कि सिस्टम उनकी बात सुनने के लिए भी तैयार नहीं है.

रिजल्ट बना मानसिक बोझ

इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा असर छात्रों की मानसिक स्थिति पर पड़ा. रिजल्ट खराब आने के बाद कई छात्र तनाव और अवसाद में चले गए. जिन बच्चों ने प्रतियोगी परीक्षाओं या कॉलेज एडमिशन की तैयारी की थी, उनके सामने भविष्य को लेकर डर खड़ा हो गया. अभिभावकों का कहना है कि एक तकनीकी गलती किसी छात्र के करियर पर भारी पड़ सकती है.

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बोर्ड रिजल्ट पहले से ही छात्रों पर मानसिक दबाव डालते हैं. ऐसे में जब बच्चे अपनी मेहनत पर सवाल उठते देखते हैं तो उनका आत्मविश्वास टूटने लगता है. कई परिवारों ने बच्चों को काउंसलिंग तक दिलानी शुरू कर दी है.

सोशल मीडिया पर कैसे फूटा गुस्सा?

जैसे ही रिजल्ट विवाद बढ़ा, सोशल मीडिया पर छात्रों और अभिभावकों का गुस्सा खुलकर सामने आने लगा. X, इंस्टाग्राम और फेसबुक पर हजारों पोस्ट वायरल होने लगीं. कई छात्रों ने अपनी मार्कशीट शेयर करते हुए लिखा कि “मेहनत हमने की, लेकिन नंबर सिस्टम ने तय कर दिए. कुछ पोस्ट इतने वायरल हुए कि लाखों लोगों ने उन्हें शेयर किया. छात्रों ने #CBSERecheck और #JusticeForStudents जैसे हैशटैग चलाने शुरू कर दिए. देखते ही देखते यह मुद्दा सिर्फ शिक्षा नहीं बल्कि राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया.

वीडियो वायरल, सिस्टम बेनकाब

कुछ छात्रों ने वीडियो बनाकर अपनी कॉपियों और पुराने रिकॉर्ड दिखाए. अभिभावकों ने सवाल उठाया कि अगर डिजिटल सिस्टम इतना भरोसेमंद है तो फिर इतनी बड़ी संख्या में शिकायतें क्यों आ रही हैं. कोचिंग टीचर्स और एजुकेशन एक्सपर्ट्स ने भी इस मामले पर चिंता जताई. कुछ शिक्षकों ने यह भी कहा कि तकनीक उपयोगी जरूर है, लेकिन उसे पूरी तरह इंसानी मूल्यांकन का विकल्प नहीं बनाया जा सकता. कई कोचिंग संस्थानों ने छात्रों की तुलना पुराने प्रदर्शन से करते हुए रिजल्ट पर सवाल उठाए. इससे विवाद और ज्यादा गहरा गया.

टेक्नोलॉजी ने बढ़ाई टेंशन

शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीक मददगार जरूर हो सकती है, लेकिन पूरी शिक्षा व्यवस्था को सिर्फ मशीनों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. कई लोगों ने यह भी कहा कि डिजिटल सिस्टम में एक छोटी तकनीकी त्रुटि लाखों छात्रों के भविष्य को प्रभावित कर सकती है. यही वजह है कि सोशल मीडिया पर “भविष्य बनाम सिस्टम” की बहस छिड़ गई.

अब यह बहस सिर्फ CBSE तक सीमित नहीं रही बल्कि पूरे देश की शिक्षा नीति पर सवाल उठने लगे हैं. लोग पूछ रहे हैं कि क्या तेजी और डिजिटलाइजेशन की दौड़ में छात्रों की मेहनत और भरोसा पीछे छूटता जा रहा है. यही कारण है कि यह मुद्दा लगातार चर्चा के केंद्र में बना हुआ है.

CBSE की सफाई और सिस्टम का पक्ष

विवाद बढ़ने के बाद CBSE की तरफ से सफाई भी सामने आई. बोर्ड ने कहा कि ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम पूरी तरह सुरक्षित और पारदर्शी है. बोर्ड का दावा है कि कॉपियों की जांच कई स्तरों पर मॉनिटर की जाती है और हर एंट्री पर निगरानी रखी जाती है. CBSE ने यह भी कहा कि कुछ मामलों में तकनीकी त्रुटि या मानवीय गलती संभव हो सकती है, लेकिन बड़े स्तर पर सिस्टम फेल होने की बात सही नहीं है.

बोर्ड के अधिकारियों के मुताबिक हर साल लाखों कॉपियों की जांच की जाती है और बहुत कम मामलों में शिकायतें सामने आती हैं. हालांकि यह पहली बार नहीं है जब ऑन स्क्रीन मार्किंग को लेकर सवाल उठे हों. इससे पहले भी कुछ राज्यों और शिक्षा बोर्डों में डिजिटल मूल्यांकन को लेकर विवाद सामने आ चुके हैं. लेकिन इस बार मामला ज्यादा बड़ा इसलिए बन गया क्योंकि इसमें बड़ी संख्या में छात्रों ने शिकायत की और सोशल मीडिया पर इसे जोरदार तरीके से उठाया गया.

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की एंट्री

विवाद बढ़ने के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan को खुद सामने आना पड़ा. उन्होंने कहा कि छात्रों की हर परेशानी को गंभीरता से लिया जा रहा है और जो भी गड़बड़ियां हुई हैं, उनकी जिम्मेदारी से सरकार पीछे नहीं हटेगी. धर्मेंद्र प्रधान ने यह भी कहा कि छात्रों को किसी तरह की परेशानी न हो, इसके लिए हर संभव कोशिश की जा रही है. उन्होंने अधिकारियों को जांच और सुधार के निर्देश दिए हैं.

मंत्री के बयान के बाद छात्रों और अभिभावकों को कुछ राहत जरूर मिली, लेकिन सवाल अब भी कायम हैं. सबसे बड़ी बात यह रही कि सरकार ने पहली बार इतने खुले तरीके से जवाबदेही स्वीकार की. इससे पहले अक्सर तकनीकी गड़बड़ियों को छोटी समस्या बताकर नजरअंदाज किया जाता था. लेकिन इस बार मामला इतना बड़ा बन गया कि शिक्षा मंत्री को खुद सामने आकर भरोसा दिलाना पड़ा.

अब छात्रों को क्या राहत मिल सकती है?

CBSE ने संकेत दिए हैं कि जिन छात्रों को अपने नंबरों पर संदेह है, उन्हें री-इवैल्यूएशन और रीचेकिंग का पूरा मौका दिया जाएगा. इसके अलावा कुछ मामलों में दोबारा जांच की संभावना भी जताई जा रही है. शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तकनीकी गड़बड़ी बड़े स्तर पर साबित होती है तो बोर्ड को सिस्टम ऑडिट करवाना पड़ सकता है. कुछ लोग ग्रेस मार्क्स की संभावना भी जता रहे हैं,

हालांकि इस पर अभी कोई आधिकारिक फैसला नहीं हुआ है. अभिभावकों की मांग है कि छात्रों को सिर्फ तकनीकी प्रक्रिया के भरोसे न छोड़ा जाए. कई विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि डिजिटल सिस्टम के साथ मानवीय निगरानी भी जरूरी होनी चाहिए ताकि किसी छात्र के साथ अन्याय न हो.

सबसे बड़ा सवाल

अब इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हो गया है कि क्या डिजिटल सिस्टम छात्रों का भविष्य सुरक्षित कर पाएगा? तकनीक ने शिक्षा व्यवस्था को तेज और आधुनिक जरूर बनाया है, लेकिन क्या यह पूरी तरह भरोसेमंद भी है? कई लोग मानते हैं कि टेक्नोलॉजी भविष्य है और डिजिटल मूल्यांकन से पारदर्शिता बढ़ती है. वहीं दूसरी तरफ छात्रों और अभिभावकों का एक वर्ग मानता है कि मशीनें मेहनत और भावनाओं को नहीं समझ सकतीं.

'डिजिटल सिस्टम पर उठते बड़े सवाल'

यह विवाद सिर्फ नंबरों का नहीं है. यह उस भरोसे का सवाल है जो लाखों छात्र और उनके परिवार शिक्षा व्यवस्था पर करते हैं। अगर वही भरोसा टूटने लगे तो सबसे बड़ा नुकसान पूरे सिस्टम को होता है.आज देशभर में यही चर्चा है कि क्या आने वाले समय में छात्रों का भविष्य मेहनत से तय होगा या फिर स्क्रीन पर चल रहे किसी डिजिटल सिस्टम से? क्योंकि जिस सिस्टम को भविष्य बनाना था… उसी ने अब लाखों छात्रों को सवालों की लाइन में खड़ा कर दिया है.

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