Gravity Hole: हम जिस दुनिया में रहते हैं, वहां हर दिन नए-नए शोध होते रहते हैं, जो हमें अपनी धरती और पर्यावरण के बारे में अनोखी जानकारियां देते हैं. अब वैज्ञानिकों ने भारतीय महासागर में पाए जाने वाले एक विशाल 'ग्रैविटी होल' (Gravity Hole) के रहस्य को उजागर किया है. आपको जानकर हैरानी होगी कि यह वह स्थान है जहां पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल सामान्य से काफी कम है और समुद्र का जलस्तर 100 मीटर से अधिक नीचे चला जाता है. यह विचित्र घटना दशकों से वैज्ञानिकों के लिए पहेली बनी हुई थी, लेकिन अब भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु के शोधकर्ताओं ने इसका एक नया और दिलचस्प कारण खोजा है.
नवीनतम अध्ययन के अनुसार, इस गुरुत्वाकर्षण छिद्र के पीछे धरती के अंदर उठने वाली मैग्मा की विशाल धाराएं जिम्मेदार हो सकती हैं. इन प्रवाहों की प्रकृति ज्वालामुखी निर्माण से जुड़ी प्रक्रियाओं के समान होती है. यह खोज वैज्ञानिकों के लिए बेहद रोमांचक है क्योंकि यह इस रहस्यमयी क्षेत्र की उत्पत्ति को लेकर अब तक के सबसे ठोस प्रमाणों में से एक है.
सीधे शब्दों में कहें तो भारतीय महासागर जियोइड लो (Indian Ocean Geoid Low - IOGP), जिसे आमतौर पर 'ग्रैविटी होल' कहा जाता है, यह एक अद्वितीय गुरुत्वाकर्षण विसंगति (Gravitational Anomaly) है. यह भारत के दक्षिणी सिरे के पास स्थित है और लगभग 1.2 मिलियन वर्ग मील (3 मिलियन वर्ग किलोमीटर) के क्षेत्र को कवर करता है. यह पृथ्वी के जियोइड में एक बड़ा गड्ढा जैसा है, जहां गुरुत्वाकर्षण बल कमजोर होता है और जलस्तर सामान्य से 106 मीटर नीचे चला जाता है.
वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र की उत्पत्ति को समझने के लिए सुपरकंप्यूटर की मदद से पिछले 140 मिलियन वर्षों का सिमुलेशन किया. यह अध्ययन 'Geophysical Research Letters' जर्नल में प्रकाशित हुआ है. अध्ययन में पता चला कि यह क्षेत्र प्राचीन अफ्रीकी सुपरप्लूम (African Superplume) से निकले मैग्मा के प्रवाह के कारण बना है. यह प्रवाह उस समय शुरू हुआ जब धरती पर एक प्राचीन महासागर मौजूद था
इस विचित्र क्षेत्र की खोज सबसे पहले 1948 में डच भू-भौतिकीविद फेलिक्स एंड्रीस वेनिंग मेनेस (Felix Andries Vening Meinesz) ने एक समुद्री गुरुत्वाकर्षण सर्वेक्षण के दौरान की थी. हालांकि, इसकी सटीक उत्पत्ति वैज्ञानिकों के लिए लंबे समय तक रहस्य बनी रही. हाल ही में किए गए शोध से पता चलता है कि यह विसंगति महाद्वीपीय टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल और प्राचीन टेथीस महासागर (Tethys Ocean) के विलुप्त होने से भी जुड़ी हो सकती है.
पृथ्वी की सतह पूरी तरह समतल या गोलाकार नहीं है. वैज्ञानिकों के अनुसार, यह एक 'अनियमित आलू' (Lumpy Potato) की तरह है, जिसमें कुछ क्षेत्र अधिक घने होते हैं और कुछ कम घने. गुरुत्वाकर्षण का स्तर भी इसी वजह से अलग-अलग जगहों पर अलग होता है. नई रिसर्च के अनुसार, जब प्राचीन महासागर के टुकड़े पृथ्वी के मेंटल (Mantle) में समा गए, तो उनके स्थान पर कम घनत्व वाली मैग्मा धाराएं ऊपर उठीं. इस वजह से यह क्षेत्र पृथ्वी के अन्य हिस्सों की तुलना में कम घना हो गया, जिससे गुरुत्वाकर्षण बल कम हुआ और जलस्तर भी नीचे चला गया.
यह अध्ययन न केवल पृथ्वी की भूगर्भीय गतिविधियों को समझने में मदद करेगा, बल्कि इससे समुद्र विज्ञान, जलवायु परिवर्तन और ग्रहों के विकास पर भी नए शोधों को बल मिलेगा. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस प्रकार की गुरुत्वाकर्षण विसंगतियां अन्य ग्रहों पर भी हो सकती हैं, जिससे भविष्य में अंतरिक्ष अनुसंधान के नए द्वार खुल सकते हैं. First Updated : Tuesday, 11 March 2025