नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्रवाई शुरू करने से परहेज किया. मामला आवारा कुत्तों के प्रबंधन से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर उनके द्वारा की गई आलोचनाओं से जुड़ा था. जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एन.वी. अंजारी की तीन सदस्यीय बेंच ने कहा कि मेनका गांधी ने अदालत के आदेशों पर "हर तरह की टिप्पणियां" की हैं, जिससे उनकी दृष्टि में "अदालत की अवमानना" सामने आती है. फिर भी, बेंच ने उदारता दिखाते हुए फिलहाल कार्रवाई शुरू नहीं करने का निर्णय लिया.
सुप्रीम कोर्ट ने मेनका गांधी के वकील से यह भी पूछा कि पूर्व केंद्रीय मंत्री के रूप में उन्होंने आवारा कुत्तों की समस्या के समाधान के लिए बजट में कितना योगदान दिलाने में मदद की थी. अदालत ने यह स्पष्ट किया कि कुत्तों को खाना खिलाने वालों को जिम्मेदार ठहराने के संबंध में उनके बयान गंभीरता से लिए जाने चाहिए, व्यंग्यपूर्ण नहीं. 13 जनवरी को ही सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिया था कि कुत्तों के काटने के मामलों में "भारी मुआवजा" दिया जाए और ऐसे मामलों के लिए कुत्तों को भोजन देने वालों को जिम्मेदार ठहराया जाए.
पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन से कहा कि उन्होंने अपने मुवक्किल के बयान पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया. अदालत ने कहा कि मेनका गांधी ने "बिना सोचे-समझे सबके खिलाफ टिप्पणियां की हैं" और उनके दृष्टिकोण को गंभीरता से नहीं लिया गया. रामचंद्रन ने जवाब दिया कि बजट आवंटन नीतिगत मामला है और उन्होंने पहले भी आतंकवादी अजमल कसाब के पक्ष में बहस की है. जस्टिस नाथ ने टिप्पणी की, "अजमल कसाब ने अदालत की अवमानना नहीं की, लेकिन आपके मुवक्किल ने की है."
मेनका गांधी ने आवारा कुत्तों के खिलाफ जबरदस्ती के दृष्टिकोण का विरोध किया है. उनका कहना है कि समस्या कुत्तों की नहीं, बल्कि नागरिक और सरकारी प्रणालियों की विफलता की है. नगर निगम के नसबंदी कार्यक्रम अक्सर केवल कागजों पर ही मौजूद होते हैं. वहीं कचरा, अस्पतालों का भोजन और जैव-चिकित्सा अपशिष्ट खुले में फेंक दिए जाते हैं, जिससे कुत्तों का इकट्ठा होना स्वाभाविक है. उन्होंने लिखा कि जब कारण को ठीक करना छोड़ दिया जाए और सिर्फ लक्षणों को दंडित किया जाए, तो समाधान नहीं मिलता. टूटी हुई व्यवस्था से चमत्कार की उम्मीद करना विफलता की स्वीकारोक्ति है.
मेनका गांधी ने अदालत से अपील की कि वह सार्वजनिक संस्थानों की वास्तविक स्थिति पर ध्यान दें. उनके अनुसार, समस्या का समाधान कुत्तों को दंडित करना नहीं बल्कि व्यवस्था सुधारना है. कुत्तों के व्यवहार को दोष देना उचित नहीं, बल्कि यह दिखाता है कि प्रशासनिक तंत्र अपने दायित्वों को सही ढंग से निभाने में असफल रहा है. First Updated : Tuesday, 20 January 2026