आखिर पीएम मोदी को पत्र लिखने की तैयारी क्यों कर रहा विपक्ष जानिए पूरी कहानी

लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक आवश्यक बहुमत न मिलने के कारण पारित नहीं हो सका, जिसके बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है. विपक्ष सरकार पर इसे परिसीमन से जोड़कर राजनीति करने का आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार विपक्ष पर सुधार में बाधा डालने का आरोप लगा रही है.

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लोकसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक के पारित न हो पाने के बाद देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है. संसद के भीतर शुरू हुआ यह मुद्दा अब सड़कों और जनसभाओं तक पहुंच गया है, जहां विपक्षी दल इसे लेकर साझा रणनीति बनाने में जुट गए हैं. विभिन्न दलों के बीच इस विषय पर एकजुटता दिखाने की कोशिशें तेज हो गई हैं.

पीएम मोदी को पत्र लिखने की तैयारी

सूत्रों के मुताबिक, विपक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर महिला आरक्षण से जुड़े पुराने विधेयक को लागू करने की मांग करने की तैयारी कर रहा है. उनका मानना है कि पहले से सहमति प्राप्त प्रस्ताव को ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए, बजाय इसके कि नए प्रावधानों के जरिए प्रक्रिया को जटिल बनाया जाए.

कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने भी सरकार के रुख पर सवाल उठाते हुए इसे खुली चुनौती दी है. उन्होंने केंद्र से मांग की है कि पहले पारित हो चुके विधेयक को दोबारा संसद में लाया जाए, ताकि स्पष्ट हो सके कि कौन इस मुद्दे पर महिलाओं के पक्ष में खड़ा है और कौन नहीं. उनका कहना है कि विपक्ष इस प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए तैयार है.

देशभर में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करने की योजना

इसी बीच, इंडिया गठबंधन की पार्टियां देशभर में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करने की योजना बना रही हैं. इन आयोजनों के जरिए वे यह संदेश देना चाहती हैं कि वे महिला आरक्षण के पक्षधर हैं, लेकिन सरकार पर आरोप है कि वह इसे परिसीमन से जोड़कर राजनीतिक समीकरण बदलने की कोशिश कर रही है.

हाल ही में हुई एक बैठक में विपक्षी नेताओं ने आपसी तालमेल पर संतोष जताया और एक-दूसरे को बधाई दी. सोनिया गांधी ने सहयोगी दलों के प्रति आभार भी व्यक्त किया. दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि वह महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए प्रतिबद्ध है. इससे पहले पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 में भी इसी प्रकार का प्रावधान किया गया था.

लोकसभा में नहीं मिला बहुमत 

शुक्रवार को लोकसभा में इस विधेयक को पारित कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका. लंबी चर्चा के बाद हुए मतदान में 298 सांसदों ने इसके समर्थन में और 230 ने विरोध में वोट दिया, जिसके चलते प्रस्ताव गिर गया. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक आवश्यकताओं के पूरा न होने के कारण विधेयक पारित नहीं हो पाया.

इस घटनाक्रम के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है, जिससे यह मुद्दा आने वाले समय में और अधिक राजनीतिक रूप से गरमाने की संभावना है. First Updated : Saturday, 18 April 2026