नई दिल्ली: वैश्विक स्तर पर तेल आपूर्ति को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के बीच बाजार संभावित संकट के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं. वहीं दूसरी ओर, चीन की रणनीति एक अलग ही कहानी बयां कर रही है, जो यह संकेत देती है कि वह इस अस्थिरता के दौर के लिए पहले से तैयार था.
तेल की कीमतों में गिरावट न आने और बाजार में लगातार बनी अस्थिरता के पीछे चीन की यह रणनीति एक अहम कारण मानी जा रही है. बीजिंग ने महीनों पहले ही ऐसे कदम उठाए, जो आज के हालात में उसे अन्य देशों से आगे खड़ा करते हैं.
लैरी फिंक ने चेतावनी देते हुए कहा कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो सकती है.
उन्होंने कहा कि तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, जो"वैश्विक मंदी को जन्म दे सकती है".
मैक्वेरी, कोटक सिक्योरिटीज और नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज जैसी ब्रोकरेज फर्मों ने भी अनुमान जताया है कि कीमतें 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं.
जहां दुनिया होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम मार्गों पर नजर रख रही है, वहीं चीन ने महीनों पहले ही संभावित संकट को भांपते हुए अपनी तैयारी शुरू कर दी थी.
2025 की शुरुआत से ही चीन अपनी घरेलू जरूरतों से अधिक कच्चा तेल आयात कर रहा है. जनवरी और फरवरी में ही देश ने करीब 1.24 मिलियन बैरल प्रतिदिन अतिरिक्त तेल जमा किया, जो स्पष्ट रूप से भंडारण की रणनीति को दर्शाता है.
चीन ने रूस, ईरान और वेनेजुएला जैसे प्रतिबंध झेल रहे देशों से भारी छूट पर कच्चा तेल खरीदा. इससे उसे वैश्विक बाजार की तुलना में कम कीमत पर तेल प्राप्त हुआ.
ऊर्जा विशेषज्ञ अनस अलहाजी के अनुसार,"दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक और इन पुनर्निर्देशित प्रवाहों के प्राथमिक खरीदार के रूप में, चीन ने भू-राजनीतिक प्रतिबंधों को प्रभावी रूप से ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने और लागत बचत के अवसर में बदल दिया है."
पिछले एक दशक में चीन ने एक दो-स्तरीय भंडारण प्रणाली विकसित की है, जिसमें सरकारी रणनीतिक भंडार और राज्य-नियंत्रित वाणिज्यिक टैंक शामिल हैं.
इन भंडारों की कुल क्षमता लगभग 1.1 से 1.2 बिलियन बैरल आंकी गई है, जिसमें भूमिगत गुफाओं से लेकर बड़े टैंक फार्म शामिल हैं.
चीन ने अपने भंडार को सिर्फ आपातकालीन उपयोग तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे एक सक्रिय बाजार उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया है. कम कीमतों पर बड़े पैमाने पर खरीद और जरूरत पड़ने पर आपूर्ति को रोकने की रणनीति ने वैश्विक बाजार को प्रभावित किया है.
2025 और 2026 के दौरान प्रतिदिन 10 लाख बैरल से अधिक अतिरिक्त आपूर्ति को अवशोषित कर चीन ने कीमतों को स्थिर बनाए रखने में भूमिका निभाई है.
इस रणनीति के चलते चीन न सिर्फ दुनिया का सबसे बड़ा तेल खरीदार बन गया है, बल्कि वह ऐसा खिलाड़ी भी बन गया है जो मांग और आपूर्ति दोनों पक्षों से कीमतों को प्रभावित कर सकता है.
ओपेक प्लस और पश्चिमी देशों के लिए यह एक नई चुनौती बनकर उभरा है, क्योंकि अब उन्हें चीन के फैसलों के अनुसार अपनी नीतियों को समायोजित करना पड़ सकता है.
चीन को ईरान संकट के समय या स्वरूप का सटीक अंदाजा भले ही न रहा हो, लेकिन उसने यह समझ लिया था कि सस्ते और स्थिर तेल का दौर खत्म होने वाला है.
इसी सोच के तहत समय रहते भंडार बढ़ाकर और उसे रणनीतिक हथियार में बदलकर, बीजिंग ने खुद को इस अस्थिर दौर के लिए तैयार कर लिया. First Updated : Thursday, 26 March 2026