नई दिल्ली : पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच इजरायल ने परमाणु समझौते को लेकर अपनी शर्तें दुनिया के सामने स्पष्ट कर दी हैं. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से हालिया मुलाकात के बाद कहा कि ईरान के साथ कोई भी समझौता तब तक प्रभावी नहीं होगा, जब तक उसका परमाणु बुनियादी ढांचा पूरी तरह खत्म नहीं किया जाता. वाशिंगटन और तेहरान के बीच होने वाली महत्वपूर्ण वार्ता से ठीक पहले आया यह बयान इस पूरे अंतरराष्ट्रीय सौदे की दिशा और भविष्य को काफी जटिल बना सकता है.
नेतन्याहू ने अमेरिकी यहूदी संगठनों के वार्षिक सम्मेलन में कहा कि केवल यूरेनियम संवर्धन प्रक्रिया को रोकना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है. उनके अनुसार, ईरान में संवर्धन की क्षमता को जड़ से मिटाना आवश्यक है. उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक वे मशीनें और इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद हैं जो परमाणु ईंधन बना सकते हैं, तब तक दुनिया सुरक्षित नहीं है. इजरायल चाहता है कि समझौते में समृद्ध सामग्री को देश से बाहर ले जाने का कड़ा प्रावधान अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए.
इस सप्ताह अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की वार्ता होने वाली है. दोनों देशों ने दशकों पुराने विवाद को सुलझाने और किसी भी संभावित सैन्य टकराव से बचने के लिए बातचीत की मेज पर वापसी की है. ईरानी राजनयिकों का संकेत है कि वे एक ऐसे समझौते की तलाश में हैं जो दोनों पक्षों को भरपूर आर्थिक लाभ दे सके. हालांकि, इजरायल की कड़ी शर्तों और नेतन्याहू के संदेह ने वार्ताकारों के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है जिससे कूटनीतिक तनाव बढ़ सकता है.
ईरान इस परमाणु समझौते को अपनी चरमराती अर्थव्यवस्था को उबारने के एक बड़े अवसर के रूप में देख रहा है. ईरानी विदेश मंत्रालय के अनुसार, वे तेल, गैस और खनन क्षेत्र में अमेरिकी निवेश को आकर्षित करना चाहते हैं. यहां तक कि आधुनिक विमानों की खरीद भी इस बातचीत का मुख्य हिस्सा है. तेहरान का मानना है कि यदि अमेरिका को भी इन क्षेत्रों में आर्थिक लाभ मिलता है, तो समझौता लंबे समय तक टिका रह सकता है. यह रुख ईरान की बदलती कूटनीति की ओर इशारा करता है.
बातचीत की मेज के साथ-साथ युद्ध की तैयारियां भी समानांतर चल रही हैं. अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने क्षेत्र में दूसरा विमानवाहक पोत तैनात कर दिया है. यह कदम ईरान पर दबाव बनाने और वार्ता विफल होने की स्थिति में लंबे समय तक चलने वाले सैन्य अभियान के लिए तैयार रहने का स्पष्ट संकेत है. सैन्य शक्ति और कूटनीति का यह दोहरा खेल तेहरान को समझौते के प्रति अधिक गंभीर बनाने की एक सोची-समझी अमेरिकी रणनीति मानी जा रही है.
एक तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परमाणु वार्ता चल रही है, तो दूसरी तरफ ईरान के निर्वासित युवराज रजा पहलवी ने विद्रोह का बिगुल फूंक दिया है. उन्होंने मौलवी शासन के खिलाफ दुनिया भर के प्रमुख शहरों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों का आह्वान किया है. हाल के आर्थिक संकट और सरकार की दमनकारी कार्रवाइयों ने जनता में भारी असंतोष पैदा किया है. रजा पहलवी चाहते हैं कि ईरान में सत्ता परिवर्तन हो और पुरानी व्यवस्था की वापसी हो, जिससे वहां की राजनीतिक स्थिति और संवेदनशील हो गई है. First Updated : Monday, 16 February 2026