Israel Law: फिलिस्तीनियों के लिए मौत की सजा अनिवार्य, इजराइल संसद में विवादित बिल पास
इजराइल की संसद ने एक विवादित कानून पास कर वेस्ट बैंक के फिलिस्तीनियों के लिए मौत की सजा को अनिवार्य बना दिया है. इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है और मानवाधिकारों को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं.

नई दिल्ली: इजराइल की संसद ने एक बड़ा और विवादास्पद फैसला लेते हुए ऐसा कानून पारित कर दिया है, जो वेस्ट बैंक के फिलिस्तीनियों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान करता है. इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है, क्योंकि इसे मानवाधिकारों के नजरिए से भी देखा जा रहा है.
62-48 मतों से पारित इस कानून के तहत घातक आतंकवादी हमलों के दोषी पाए गए फिलिस्तीनियों के लिए मौत की सजा को अनिवार्य बनाया गया है. यह बिल लंबे समय से इजराइल के दक्षिणपंथी नेताओं की प्राथमिकताओं में शामिल रहा है और इसे सजा को और कठोर बनाने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है.
दक्षिणपंथी नेताओं की बड़ी जीत
इस विधेयक के पारित होने को राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन गिवीर और उनकी ओत्जमा येहुदित पार्टी की बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है. उन्होंने लंबे समय से इस कानून के लिए जोर दिया था. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी इसके समर्थन में मतदान किया.
बेन गिवीर ने कहा, "यह पीड़ितों के लिए न्याय का दिन है. आतंकवादियों के लिए अब कोई खुला रास्ता नहीं, बल्कि एक स्पष्ट संदेश है कि जो भी आतंकवाद को चुनता है, वह मौत को चुनता है."
आतंकवादी मामलों में अनिवार्य मौत की सजा
करीब 12 घंटे तक चली बहस के बाद यह कानून पारित किया गया. इसके तहत सैन्य अदालतों द्वारा घातक आतंकवादी मामलों में दोषी पाए गए वेस्ट बैंक के निवासियों के लिए फांसी को डिफ़ॉल्ट सजा बना दिया गया है.
हालांकि, ‘विशेष परिस्थितियों’ में न्यायाधीश आजीवन कारावास का विकल्प चुन सकते हैं, लेकिन अन्य मामलों में मौत की सजा अनिवार्य होगी. इस फैसले के लिए अब न्यायाधीशों की सर्वसम्मति की जरूरत नहीं होगी, बल्कि साधारण बहुमत ही पर्याप्त होगा. साथ ही, अपील का अधिकार भी समाप्त कर दिया गया है.
कानून का दायरा और लागू होने की स्थिति
यह कानून पिछली तारीख से लागू नहीं होगा, यानी 7 अक्टूबर के हमलों के दोषियों पर इसका असर नहीं पड़ेगा. उनके लिए अलग से एक विधेयक लाने की तैयारी की जा रही है.
केवल फिलिस्तीनियों पर लागू होगा कानून
यह कानून मुख्य रूप से फिलिस्तीनियों पर ही लागू होगा, क्योंकि इसमें इजराइली नागरिकों और निवासियों को स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है. फिलिस्तीनियों के मामलों की सुनवाई सैन्य अदालतों में होती है, जबकि इजराइली नागरिकों पर नागरिक अदालतों में मुकदमा चलता है.
हालांकि एक अलग प्रावधान के तहत किसी भी व्यक्ति को मृत्युदंड दिया जा सकता है, लेकिन इसकी शर्तें ऐसी हैं, जो व्यवहार में इसे सीमित बना देती हैं.
राजनीतिक समर्थन और विरोध
इस विधेयक को दक्षिणपंथी विपक्षी दल यिसराएल बेतेनु का भी समर्थन मिला. पार्टी प्रमुख अविग्डोर लिबरमैन ने पहले शर्त रखी थी कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू और शास नेता आर्य डेरी की उपस्थिति में ही समर्थन दिया जाएगा, जिसे बहस के अंतिम चरण में पूरा किया गया.
शास और यूनाइटेड टोरा यहूदी धर्म के डेगेल हातोराह गुट ने भी इसके पक्ष में मतदान किया, जबकि कुछ रिपोर्टों में इसके विरोध की संभावना जताई जा रही थी. वहीं यूटीजे का अगुदत यिसरेल गुट इसके खिलाफ रहा.
संयुक्त राष्ट्र ने जताई आपत्ति
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संगठन ने इस कानून पर गंभीर चिंता जताते हुए इसे तुरंत रद्द करने की मांग की है. संगठन का कहना है कि यह कानून अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत इजराइल के दायित्वों का उल्लंघन करता है.
संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि वह किसी भी परिस्थिति में मौत की सजा का समर्थन नहीं करता और इस कानून का लागू होना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होगा.
Israel must immediately repeal the discriminatory death penalty law passed today by the Knesset, as it contravenes Israel’s obligations under international law.
— UN Human Rights Palestine (@OHCHR_Palestine) March 30, 2026
The United Nations opposes the death penalty under all circumstances. The implementation of this new law would violate…
भेदभाव को लेकर बढ़ी चिंता
आलोचकों का कहना है कि यह कानून नस्लीय भेदभाव और रंगभेद के खिलाफ नियमों का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह केवल वेस्ट बैंक और इजराइल में रहने वाले फिलिस्तीनियों पर लागू होता है. साथ ही यह भी आरोप है कि कई मामलों में फिलिस्तीनियों को अनुचित मुकदमों के बाद दोषी ठहराया जाता है.


