पाकिस्तान की धार्मिक और राजनीतिक पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान को एक बार फिर प्रतिबंधित कर दिया गया है. शहबाज शरीफ की सरकार ने यह कदम तब उठाया, जब संगठन ने हाल ही में लाहौर से इस्लामाबाद तक गाज़ा मार्च निकालते हुए अमेरिकी दूतावास के सामने प्रदर्शन किया.
मुरिदके में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़पों में कई लोग घायल हुए, जिसके बाद पंजाब सरकार ने संघीय कैबिनेट से परामर्श लेकर TLP को आतंकवाद विरोधी अधिनियम के तहत प्रतिबंधित कर दिया. यह पहला मौका नहीं है जब TLP पर कार्रवाई हुई हो. 2021 में इमरान खान सरकार ने भी इस संगठन को बैन किया था, लेकिन सात महीने बाद सरकार ने दबाव में आकर प्रतिबंध हटा लिया था. अतीत में TLP ने कई बार हिंसक प्रदर्शन कर सरकार से समझौते कराए हैं, जिससे उसकी सड़कों पर शक्ति का अंदाजा लगता है.
इस संगठन की स्थापना ख़दीम हुसैन रिजवी ने की थी, जिन्होंने 2011 में गवर्नर सलमान तासीर की हत्या के बाद हत्यारे मुमताज़ क़ादरी के समर्थन में आंदोलन खड़ा किया. इसके बाद TLP ने इस्लामाबाद में कई बार हिंसक धरने दिए और राजनीतिक रूप से उभरने लगा. 2017 में चुनावी कानून संशोधन के विरोध में इस्लामाबाद-रावलपिंडी मार्ग को जाम कर देने के बाद सरकार को कानून मंत्री से इस्तीफा लेना पड़ा. इस घटना ने TLP की ताकत को सार्वजनिक रूप से साबित किया.
खदीम रिजवी की मृत्यु के बाद उनके बेटे साद हुसैन रिजवी ने नेतृत्व संभाला. पार्टी की राजनीति हमेशा ईशनिंदा के मामलों और धार्मिक भावनाओं पर केंद्रित रही. TLP पर अहमदी और ईसाई समुदायों के खिलाफ हिंसा भड़काने के आरोप भी लग चुके हैं.
राजनीतिक विश्लेषक अहमद इजाज का मानना है कि यह प्रतिबंध TLP पर इस बार असर डाल सकता है. उनका कहना है कि TLP की लोकप्रियता किसी सामाजिक विकास की प्रक्रिया से नहीं, बल्कि तत्कालीन सत्ता की जरूरतों से पैदा हुई थी. जैसे ही राज्य का समर्थन खत्म होता है ऐसे संगठनों का अस्तित्व कमजोर पड़ जाता है. First Updated : Sunday, 26 October 2025