ईरान-अमेरिका समझौते पर हस्ताक्षर के बाद भी लंबा है रास्ता, कई अहम मुद्दों पर बाकी है सहमति

ईरान और अमेरिका ने एक प्रारंभिक समझौते पर हस्ताक्षर कर बातचीत का रास्ता खोला है, लेकिन परमाणु कार्यक्रम और अन्य विवादित मुद्दों पर अंतिम सहमति बनने में अभी लंबा समय लग सकता है.

Suraj Mishra
Edited By: Suraj Mishra

नई दिल्ली: ईरान और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए समझौते को अंतरराष्ट्रीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण घटना माना जा रहा है. 17 जून को दोनों देशों के नेताओं ने एक प्रारंभिक समझौते पर हस्ताक्षर कर सकारात्मक संकेत दिए, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अंतिम और व्यापक समझौते तक पहुंचने में अभी काफी समय लग सकता है. हस्ताक्षर होने के बाद अब दोनों देशों के बीच विस्तृत वार्ताओं का दौर शुरू होगा, जिसमें कई जटिल और संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा की जाएगी.

विशेषज्ञों के अनुसार, यह समझौता केवल बातचीत की नई शुरुआत है. परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध, क्षेत्रीय सुरक्षा और रणनीतिक जलमार्गों से जुड़े विषयों पर दोनों पक्षों को विस्तृत सहमति बनानी होगी. इसी कारण यह संभावना जताई जा रही है कि अंतिम समझौते तक पहुंचने में तय समय सीमा से भी अधिक समय लग सकता है.

कई विवादित मुद्दों पर बनानी होगी सहमति

ईरान और अमेरिका के बीच वर्षों से कई ऐसे मुद्दे रहे हैं जिन पर मतभेद गहरे रहे हैं. इनमें परमाणु गतिविधियों की निगरानी, यूरेनियम संवर्धन, आर्थिक प्रतिबंधों में राहत, क्षेत्रीय सुरक्षा और अन्य रणनीतिक विषय शामिल हैं. इन सभी मामलों पर स्पष्ट और व्यवहारिक समाधान तैयार करने के लिए दोनों देशों को लंबी और विस्तृत वार्ता करनी होगी.

राजनयिक विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे समझौतों में केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि तकनीकी और कानूनी पहलुओं पर भी व्यापक सहमति जरूरी होती है. यही कारण है कि वार्ता प्रक्रिया अक्सर लंबी खिंच जाती है.

2015 की परमाणु संधि भी कई वर्षों की बातचीत का नतीजा थी

ईरान और अमेरिका के बीच पहले भी एक बड़ा परमाणु समझौता हो चुका है. वर्ष 2015 में हस्ताक्षरित इस समझौते को जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) के नाम से जाना गया. हालांकि इसकी बातचीत कई वर्ष पहले शुरू हुई थी और इसे लागू होने में भी लंबा समय लगा था.

इस समझौते में केवल अमेरिका और ईरान ही नहीं, बल्कि चीन, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे प्रमुख देशों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी. उस समय इसे वैश्विक कूटनीति की बड़ी सफलता माना गया था.

राजनीतिक बदलावों ने बढ़ाया तनाव

हालांकि 2015 का समझौता लंबे समय तक कायम नहीं रह सका। अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के बाद नीतियों में बदलाव आया और समझौते को लेकर मतभेद बढ़ने लगे. इसके परिणामस्वरूप दोनों देशों के बीच तनाव फिर से बढ़ गया और परमाणु कार्यक्रम को लेकर विवाद गहरा गया.

बाद के वर्षों में कई बार वार्ता बहाल करने के प्रयास हुए, लेकिन ठोस नतीजे सामने नहीं आए. क्षेत्रीय संघर्षों और भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने भी दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित किया.

आगे की बातचीत पर टिकी दुनिया की नजर

हालिया समझौते को सकारात्मक शुरुआत माना जा रहा है, लेकिन इसके सफल क्रियान्वयन के लिए दोनों देशों को कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर आम सहमति बनानी होगी. आने वाले महीनों में होने वाली बातचीत यह तय करेगी कि यह पहल स्थायी शांति और स्थिरता की दिशा में कितनी सफल साबित होती है. फिलहाल अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर दोनों देशों के अगले कदमों पर टिकी हुई है.

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