क्या अमेरिका लौटाएगा टैरिफ से वसूले गए अरबों डॉलर? कोर्ट के फैसले पर ट्रंप ने जताई नाराजगी

अमेरिका में टैरिफ को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देश को अरबों डॉलर लौटाने पड़ सकते हैं. इस पर डोनाल्ड ट्रंप की तीखी प्रतिक्रिया ने मामला और गरमा दिया है.

Shraddha Mishra

अमेरिका में एक बड़ा आर्थिक और कानूनी विवाद सामने आया है, जिसने सरकार की व्यापार नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं. डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के चलते देश को लगभग 159 बिलियन डॉलर की भारी रकम वापस करनी पड़ सकती है. इस बयान ने न केवल राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार को लेकर भी नई चर्चा शुरू हो गई है.

यह पूरा मामला उन टैरिफ (आयात शुल्क) से जुड़ा है, जिन्हें साल 2025 में ट्रंप प्रशासन ने अपनी सख्त व्यापार नीति के तहत लागू किया था. उस समय अमेरिका ने कई देशों से आने वाले उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाया था, जिससे सरकार को बड़ी आय हुई. लेकिन इस फैसले को बाद में अदालत में चुनौती दी गई. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि प्रशासन ने टैरिफ लगाने के लिए अपने अधिकारों की सीमा पार कर दी थी. 

अदालत का कहना था कि सरकार ने कानून के दायरे से बाहर जाकर यह निर्णय लिया, जो सही नहीं है. इस फैसले के बाद अब अमेरिका पर उन देशों को पैसा लौटाने का दबाव बन गया है, जिनसे यह शुल्क वसूला गया था. अनुमान है कि यह राशि करीब 159 बिलियन डॉलर तक हो सकती है, जो किसी भी देश के लिए बहुत बड़ी रकम है.

ट्रंप ने जताई कड़ी नाराजगी

इस फैसले पर डोनाल्ड ट्रंप ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने इसे “भयानक” और “हास्यास्पद” बताया. उनका कहना है कि ये टैरिफ अमेरिका के हित में लगाए गए थे और इससे देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली थी. ट्रंप का मानना है कि कोर्ट का यह फैसला न सिर्फ गलत है, बल्कि इससे अमेरिका को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस फैसले के लागू होने के तरीके और उसके असर को लेकर अभी कई सवाल बाकी हैं.

कई देशों पर लगाया गया था टैरिफ

ट्रंप सरकार ने उस समय कई देशों पर भारी शुल्क लगाया था. इसमें भारत, चीन, तुर्किए, कनाडा, जापान, इजरायल और मेक्सिको जैसे देश शामिल थे. शुरुआत में भारत पर करीब 50 फीसदी तक टैरिफ लगाया गया था, जो बाद में व्यापार समझौते के बाद घटाकर लगभग 18 फीसदी कर दिया गया. इस नीति का उद्देश्य अमेरिका के घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देना और विदेशी आयात को नियंत्रित करना था. हालांकि, इस कदम से कई देशों के साथ व्यापारिक तनाव भी बढ़ा था.

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