पाकिस्तान की मध्यस्थता पर ईरान में क्यों उठे विरोध के सुर? सांसद नबावियान ने खुद की सरकार को घेरा
पाकिस्तान में हुई वार्ता को लेकर ईरान के भीतर असहमति बढ़ रही है. परमाणु मुद्दे को शामिल करने पर सवाल उठे हैं, जबकि अमेरिका की कड़ी शर्तों और नाकेबंदी ने हालात को और जटिल बना दिया है.

ईरान में इस समय पाकिस्तान के जरिए हो रही शांति वार्ता को लेकर अंदरूनी असहमति खुलकर सामने आने लगी है. जहां एक ओर बातचीत के जरिए तनाव कम करने की कोशिश हो रही है, वहीं दूसरी ओर देश के भीतर ही इस रणनीति पर सवाल उठने लगे हैं. खासतौर पर परमाणु मुद्दे को चर्चा में शामिल करने को लेकर अब राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है. बुधवार को ईरान के सांसद महमूद नबावियान ने पाकिस्तान में हुई वार्ता को लेकर सरकार के फैसले की आलोचना की. उन्होंने कहा कि बातचीत में परमाणु मुद्दा उठाना एक बड़ी रणनीतिक गलती थी, जिससे विरोधी ताकतों को और मजबूत होने का मौका मिल गया.
ईरान इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, नबावियान का मानना है कि पाकिस्तान में बातचीत के दौरान परमाणु विषय को शामिल करना सही कदम नहीं था. उनके मुताबिक, इस फैसले ने अमेरिका को और ज्यादा दबाव बनाने का अवसर दे दिया. बताया जा रहा है कि वार्ता के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य के साथ-साथ परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन भी अहम मुद्दे थे. हालांकि इन विषयों पर दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन सकी.
महमूद नबावियान का बयान
संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के सदस्य नबावियान ने साफ शब्दों में कहा, “पाकिस्तान में हुई वार्ता के दौरान हमने एक रणनीतिक गलती की. हमें परमाणु मुद्दे को चर्चा में शामिल नहीं करना चाहिए था.” उन्होंने यह भी कहा कि इस कदम से विरोधी देशों का हौसला बढ़ गया है और वे अब ज्यादा आक्रामक तरीके से अपनी मांगें रख रहे हैं.
नबावियान ने केवल मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान को मध्यस्थ बनाने के फैसले पर भी सवाल उठाए. उनके अनुसार, यह निर्णय भी पूरी तरह सही नहीं था. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनका कहना है कि पाकिस्तान में बातचीत करने से अमेरिका को स्थिति का फायदा उठाने और अपनी शर्तें आगे बढ़ाने का मौका मिला.
अमेरिका की कड़ी शर्तें
नबावियान ने अमेरिका की तरफ से रखी गई मांगों का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने 60 प्रतिशत तक समृद्ध किए गए यूरेनियम को हटा दे और इस पर अगले 20 वर्षों तक रोक लगा दी जाए. हालांकि, तेहरान ने इन शर्तों को मानने से इनकार कर दिया है और अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर सख्त रुख बनाए रखा है.
इस पूरे मामले पर व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने भी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि मौजूदा युद्धविराम की कोई तय समय सीमा नहीं है और इसे अनिश्चित समय तक बढ़ाया जा सकता है. उन्होंने यह भी साफ किया कि किसी स्थायी समझौते के लिए ईरान को अपने समृद्ध यूरेनियम के भंडार को छोड़ना होगा. यह शर्त अमेरिका की प्राथमिकताओं में शामिल है, जिस पर ईरान लगातार आपत्ति जताता रहा है.
नाकेबंदी बना तनाव का कारण
फिलहाल स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं है, क्योंकि युद्धविराम के बावजूद कई शर्तें लागू हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि जब तक ईरान कोई ठोस प्रस्ताव पेश नहीं करता और बातचीत आगे नहीं बढ़ती, तब तक नाकेबंदी जारी रहेगी. इस फैसले ने दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया है.
ईरान की कड़ी प्रतिक्रिया
अमेरिका की इस नीति पर ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने नाकेबंदी को सीधे तौर पर युद्ध जैसा कदम बताया है. उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई युद्धविराम की भावना के खिलाफ है और ईरान इस तरह के दबाव को स्वीकार नहीं करेगा. साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यह दबाव जारी रहा, तो ईरान इसका कड़ा जवाब देगा.


