UAE के OPEC छोड़ने से किसे कितना नफा-नुकसान? जानिए भारत-पाक का हाल

यूएई के ओपेक से बाहर निकलने के फैसले ने खाड़ी राजनीति में नया मोड़ ला दिया है, जिससे सऊदी-पाक गठजोड़ को चुनौती मिली है. इस कदम से भारत को सस्ते तेल का फायदा मिल सकता है, जबकि पाकिस्तान पर आर्थिक और रणनीतिक दबाव बढ़ने की आशंका है.

Suraj Mishra
Edited By: Suraj Mishra

संयुक्त अरब अमीरात के हालिया फैसलों ने खाड़ी क्षेत्र की राजनीति और वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल पैदा कर दी है. तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक (OPEC) से अलग होने का उसका निर्णय सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संकेत भी माना जा रहा है. इसे सऊदी अरब के प्रभाव को चुनौती देने और पाकिस्तान-सऊदी गठजोड़ के प्रति असहमति जताने के तौर पर देखा जा रहा है.

विशेषज्ञों का क्या मानना है? 

इस कदम का असर भारत जैसे देशों पर सकारात्मक रूप से पड़ सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यूएई के ओपेक से बाहर आने के बाद वह अपनी उत्पादन क्षमता को पूरी तरह इस्तेमाल कर सकेगा, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ सकती है. अगर ऐसा होता है तो तेल की कीमतों में कमी आ सकती है, जिससे भारत जैसे आयातक देशों को राहत मिलेगी. इससे न सिर्फ ऊर्जा लागत घटेगी बल्कि महंगाई पर भी काबू पाने में मदद मिल सकती है.

पाकिस्तान के लिए यह घटनाक्रम चिंता बढ़ाने वाला साबित हो सकता है. यूएई पहले ही पाकिस्तान से 3.5 अरब डॉलर का कर्ज समय से पहले लौटाने की मांग कर चुका है, जिससे उसकी आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ा. हालांकि सऊदी अरब ने बाद में वित्तीय सहायता देकर पाकिस्तान को अस्थायी राहत जरूर दी, लेकिन यूएई की नाराजगी स्पष्ट नजर आई.

रिपोर्ट्स के अनुसार, इजराइल और अमेरिका द्वारा तेहरान पर हमलों के बाद यूएई को जवाबी कार्रवाई का सबसे ज्यादा सामना करना पड़ा. उसकी वायु रक्षा प्रणाली ने सैकड़ों मिसाइल और हजारों ड्रोन को इंटरसेप्ट किया. इस दौरान यूएई को खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के अन्य देशों से अपेक्षित समर्थन नहीं मिला, जिससे उसकी रणनीतिक सोच में बदलाव आया.

यूएई का क्या मानना है?  

यूएई का मानना है कि पाकिस्तान ने ईरान के खिलाफ स्पष्ट रुख नहीं अपनाया और मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश की, जो अबू धाबी को स्वीकार नहीं थी. यही वजह है कि दोनों देशों के रिश्तों में खटास बढ़ी.

इस बीच, खाड़ी क्षेत्र में नए समीकरण भी उभरते दिख रहे हैं. एक ओर यूएई भारत के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है. वहीं सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच करीबी बढ़ने की चर्चा है. यमन और सूडान जैसे क्षेत्रों में भी यूएई और सऊदी अरब के बीच मतभेद सामने आए हैं.

करीब छह दशकों बाद ओपेक से बाहर निकलने का यूएई का फैसला यह संकेत देता है कि वह अब स्वतंत्र ऊर्जा नीति अपनाना चाहता है और सऊदी नेतृत्व के साये से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है. आने वाले समय में यह कदम खाड़ी राजनीति और वैश्विक ऊर्जा संतुलन को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है.

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