गर्मियों में भी क्यों नीम करोली बाबा ओढ़ते थे कंबल, जानें इसके पीछे क्या है भक्तों की मान्यता?
नीम करोली बाबा देश के उन संतों में गिने जाते हैं, जिनके प्रति भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी गहरी आस्था देखने को मिलती है. बाबा के भक्त दादा मुखर्जी के अनुसार, महाराज जी का कंबल केवल पहनने की वस्तु नहीं था, बल्कि वैराग्य, सादगी और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना जाता था.

नई दिल्ली: नीम करोली बाबा देश के उन संतों में गिने जाते हैं, जिनके प्रति भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी गहरी आस्था देखने को मिलती है. उनके जीवन से जुड़े कई प्रसंग आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बने रहते हैं. इन्हीं में से एक है उनका हर मौसम में ऊनी कंबल ओढ़े रहने का अंदाज। बता दें, भीषण गर्मी हो या कड़ाके की सर्दी, बाबा को अक्सर एक ही कंबल में देखा जाता था. हालांकि, इसके पीछे कोई आधिकारिक या ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन उनके भक्त इससे जुड़ी कई आध्यात्मिक मान्यताओं का उल्लेख करते हैं.
बाबा के कंबल में थी आध्यात्मिक ऊर्जा
बाबा के भक्त दादा मुखर्जी के अनुसार, महाराज जी का कंबल केवल पहनने की वस्तु नहीं था, बल्कि वैराग्य, सादगी और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना जाता था. उनका कहना था कि बाबा जहां भी जाते, वह कंबल हमेशा उनके साथ रहता था. कई भक्त यह भी मानते हैं कि उस कंबल से विशेष प्रकार की सुगंध महसूस होती थी और उसमें एक अलग आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव होता था.
त्याग और साधारण जीवन जीने का संदेश
इतना ही नहीं भक्तों के अनुसार, बाबा बाहरी दिखावे से दूर रहने और त्याग का संदेश देने के लिए साधारण जीवन जीते थे. उनका कंबल इस बात का प्रतीक माना जाता था कि मनुष्य को भौतिक वस्तुओं के बजाय आत्मिक विकास पर ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही ऐसी भी मान्यता है कि बाबा अपने अनुयायियों के दुख और कष्टों को अपने ऊपर लेने की भावना रखते थे और कंबल उसी करुणा का प्रतीक बन गया था. हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है.
उत्तराखंड में स्थित आश्रम
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक रिचर्ड एलपर्ट, जिन्हें बाद में राम दास के नाम से जाना गया, उन्होंने अपनी पुस्तक मिरेकल ऑफ लव में भी नीम करोली बाबा के जीवन से जुड़े कई अनुभवों का उल्लेख किया है. इसी वजह से आज भी उत्तराखंड स्थित कैंची धाम आश्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और कई भक्त फूल-मालाओं के साथ कंबल भी अर्पित करते हैं.
कब हुआ बाबा का निधन?
1973 में बाबा के निधन के दशकों बाद भी उनकी कंबल ओढ़े तस्वीरें श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बनी हुई हैं. उनके अनुयायी इसे प्रेम, सेवा, त्याग और आध्यात्मिक शांति का प्रतीक मानते हैं. हालांकि, इतिहास में यह स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता कि बाबा हर मौसम में कंबल क्यों ओढ़ते थे, लेकिन भक्तों की नजर में इसका महत्व केवल एक वस्त्र से कहीं अधिक है.


