नई दिल्ली: आगामी विधानसभा चुनावों से पहले केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के क्रियान्वयन की निगरानी के लिए एक 'सशक्त समिति' का गठन किया है. 2024 में अधिसूचित नियमों के तहत गठित यह समिति राज्य में CAA से जुड़े आवेदनों की जांच और अंतिम मंजूरी की जिम्मेदारी संभालेगी.
यह समिति अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों के नागरिकता आवेदनों का परीक्षण करेगी. साथ ही यह सुनिश्चित करेगी कि आवेदन पूर्ण हों और वे नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6B के तहत निर्धारित सभी मानकों पर खरे उतरते हों.
नई समिति CAA के तहत दायर नागरिकता आवेदनों की समीक्षा और अनुमोदन के लिए अंतिम प्राधिकरण के रूप में कार्य करेगी. इसका मुख्य उद्देश्य लंबित आवेदनों का निस्तारण करना और प्रक्रिया को व्यवस्थित ढंग से लागू करना है.
Ministry of Home Affairs (MHA) के आधिकारिक आदेश के अनुसार, पश्चिम बंगाल के लिए गठित इस सशक्त समिति की संरचना इस प्रकार है
डिप्टी रजिस्ट्रार जनरल, जनगणना कार्य निदेशालय, पश्चिम बंगाल
नियम 11A के तहत, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई समुदाय के वे लोग जो 31 दिसंबर 2014 तक भारत आ चुके थे, नागरिकता के लिए पात्र हैं.
इन सभी आवेदकों को अपना आवेदन इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से जमा करना होगा. समिति यह सुनिश्चित करेगी कि सभी दस्तावेज और शर्तें नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6B के अनुरूप हों.
यह निर्णय पश्चिम बंगाल की सियासत में अहम मायने रखता है.
बांग्लादेश से विस्थापित होकर आए लाखों मतुआ और बंगाली हिंदू लंबे समय से भारतीय नागरिकता की प्रतीक्षा कर रहे हैं. यह समुदाय राज्य में एक प्रभावशाली वोट बैंक माना जाता है.
All India Trinamool Congress (TMC) का कहना है कि CAA से मतुआ समुदाय के मतदान अधिकार प्रभावित हो सकते हैं. पार्टी के महासचिव Abhishek Banerjee ने समुदाय से CAA शिविरों से दूर रहने की अपील की है. वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्पष्ट किया है कि वह बंगाल में CAA लागू नहीं होने देंगी.
केंद्र द्वारा इस सशक्त समिति का गठन पश्चिम बंगाल में CAA को लेकर व्याप्त भ्रम और गतिरोध को दूर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. First Updated : Saturday, 21 February 2026