“अंग्रेज ले गए थे भोजशाला की सबसे बड़ी धरोहर, क्या अब लौटेगी मां सरस्वती की प्रतिमा?
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के भोजशाला पर आए बड़े फैसले के बाद अब सिर्फ मंदिर-मस्जिद विवाद ही नहीं, बल्कि मां सरस्वती की उस ऐतिहासिक प्रतिमा की चर्चा भी तेज हो गई है, जो करीब 150 साल पहले भारत से लंदन पहुंच गई थी। यह केवल एक मूर्ति की कहानी नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक विरासत की उस पीड़ा की कहानी है, जिसे आज भी देश महसूस करता है।

इस पूरी कहानी की शुरुआत 11वीं सदी से होती है। परमार वंश के महान शासक राजा भोज ने वर्ष 1034 ईस्वी में धार नगरी में एक भव्य संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना करवाई थी, जिसे “सरस्वती कंठाभरण महाविद्यालय” या भोजशाला कहा गया। कहा जाता है कि यह सिर्फ एक मंदिर नहीं था, बल्कि उस दौर में शिक्षा, दर्शन, वेद, ज्योतिष और साहित्य का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता था। यहां देशभर से विद्वान अध्ययन करने आते थे।
राजा भोज मां सरस्वती के परम भक्त माने जाते थे। इसी कारण उन्होंने भोजशाला परिसर में मां वाग्देवी यानी मां सरस्वती की एक अद्भुत प्रतिमा स्थापित करवाई थी। यह प्रतिमा केवल धार्मिक प्रतीक नहीं थी, बल्कि ज्ञान और भारतीय सभ्यता की पहचान मानी जाती थी। इतिहासकार बताते हैं कि उस दौर में भोजशाला में संस्कृत श्लोकों और वेद मंत्रों की गूंज सुनाई देती थी।
आक्रमणों ने उजाड़ दिया भोजशाला का वैभव
समय के साथ भारत में विदेशी आक्रमण बढ़ने लगे। कई मुस्लिम आक्रांताओं ने भोजशाला परिसर को निशाना बनाया। ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स के अनुसार, इस परिसर को कई बार क्षति पहुंचाई गई। धीरे-धीरे यह भव्य विश्वविद्यालय और मंदिर खंडहर में तब्दील हो गया।
हमलों के दौरान मां सरस्वती की प्रतिमा भी मलबे के नीचे दब गई। सदियों तक यह प्रतिमा लोगों की नजरों से दूर रही। भोजशाला का गौरवशाली इतिहास धीरे-धीरे धुंधला पड़ता गया। हालांकि स्थानीय लोगों और हिंदू संगठनों के बीच यह मान्यता हमेशा बनी रही कि यहां कभी मां सरस्वती विराजमान थीं।
अंग्रेज अफसर को खुदाई में मिली मां सरस्वती की प्रतिमा
करीब 800 साल बाद, वर्ष 1875 में भोजशाला की कहानी ने नया मोड़ लिया। उस समय धार क्षेत्र अंग्रेजों के नियंत्रण में था। धार के तत्कालीन राजनीतिक एजेंट मेजर जनरल विलियम किनकैड को खुदाई के दौरान यह प्रतिमा मिली।
बताया जाता है कि किनकैड को प्राचीन भारतीय कलाकृतियों और मूर्तियों में गहरी रुचि थी। उस समय भारत अंग्रेजों के अधीन था और ब्रिटिश अफसर भारतीय धरोहरों को अपने कब्जे में लेने का अधिकार समझते थे। यही वजह थी कि मां सरस्वती की यह दुर्लभ प्रतिमा भी अंग्रेजी शासन की नजरों से बच नहीं सकी।
कैसे पहुंची लंदन?
इतिहासकारों के अनुसार, वर्ष 1886 से 1891 के बीच विलियम किनकैड इस प्रतिमा को अपने साथ इंग्लैंड ले गया। इसके बाद यह प्रतिमा ब्रिटिश म्यूजियम में “Saraswati of Dhar” नाम से प्रदर्शित की जाने लगी।
भारतीय पुरातत्व विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रतिमा परमारकालीन कला का अद्भुत नमूना है। इसकी नक्काशी, मुद्रा और शिल्पकला भारतीय मूर्तिकला के स्वर्णकाल को दर्शाती है। कई इतिहासकार मानते हैं कि अंग्रेज केवल भारत का धन नहीं लूट रहे थे, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक पहचान को भी बाहर ले जा रहे थे। यही वजह है कि अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या मां सरस्वती की प्रतिमा को भारत से ले जाना केवल कला संग्रह था या फिर भारत की ज्ञान परंपरा को कमजोर करने की एक औपनिवेशिक मानसिकता का हिस्सा?
हाईकोर्ट के फैसले के बाद तेज हुई वापसी की मांग
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने भोजशाला विवाद पर बड़ा फैसला सुनाते हुए हिंदू पक्ष की कई दलीलों को स्वीकार किया। अदालत ने अपने फैसले में उन प्रतिवेदनों का भी उल्लेख किया, जिनमें मां सरस्वती की प्रतिमा को लंदन से वापस भारत लाने की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में कहा कि जब सरकार विदेशों से अन्नपूर्णा देवी समेत कई प्राचीन मूर्तियां वापस ला सकती है, तो भोजशाला की अधिष्ठात्री देवी मां वाग्देवी को भी उनके मूल स्थान पर वापस लाया जाना चाहिए। हिंदू पक्ष का कहना है कि जब तक मां सरस्वती की प्रतिमा भोजशाला में वापस स्थापित नहीं होती, तब तक भोजशाला का पुनरुद्धार अधूरा रहेगा।
क्या भारत सरकार शुरू करेगी बड़ा अभियान?
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा है कि भारत सरकार इस मामले में कानून और कूटनीति के दायरे में रहकर विचार कर सकती है। इसके बाद अब यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या भारत सरकार ब्रिटेन से आधिकारिक रूप से मां सरस्वती की प्रतिमा की वापसी की मांग करेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह प्रतिमा वापस आती है, तो यह केवल धार्मिक जीत नहीं होगी, बल्कि भारत की सांस्कृतिक अस्मिता की ऐतिहासिक वापसी मानी जाएगी। पिछले कुछ वर्षों में भारत कई प्राचीन मूर्तियां और कलाकृतियां विदेशों से वापस ला चुका है। ऐसे में भोजशाला की प्रतिमा को लेकर भी उम्मीद बढ़ गई है।
सिर्फ मूर्ति नहीं, भारत की पहचान का सवाल
भोजशाला विवाद अब केवल मंदिर और मस्जिद तक सीमित नहीं रह गया है। यह भारत की उस ऐतिहासिक स्मृति का हिस्सा बन चुका है, जिसमें सदियों की सांस्कृतिक लूट, आक्रमण और औपनिवेशिक मानसिकता की परछाईं दिखाई देती है।
मां सरस्वती की प्रतिमा को कई लोग भारत की “ज्ञान शक्ति” का प्रतीक मानते हैं। यही वजह है कि अब यह मांग केवल धार्मिक संगठनों तक सीमित नहीं है, बल्कि इतिहासकार, संस्कृति विशेषज्ञ और आम लोग भी चाहते हैं कि यह प्रतिमा अपने मूल स्थान पर वापस आए।
दुनिया भर में गूंज रही भोजशाला की चर्चा
हाईकोर्ट के फैसले के बाद भोजशाला एक बार फिर राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गई है। सोशल मीडिया पर लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर भारत की इतनी बड़ी धरोहर आज भी विदेशी संग्रहालय में क्यों कैद है। कई लोगों का कहना है कि अब समय आ गया है जब भारत अपनी खोई हुई सांस्कृतिक विरासत को वापस लाने के लिए वैश्विक स्तर पर निर्णायक पहल करे।
भोजशाला की यह कहानी सिर्फ अतीत की कहानी नहीं, बल्कि उस भावनात्मक जुड़ाव की कहानी है, जो भारत को उसकी सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान परंपरा से जोड़ती है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या मां सरस्वती एक दिन फिर भोजशाला में विराजमान होंगी।


