छत्तीसगढ़ के दुर्ग में शिव जी के साथ होती है कुत्ते की पूजा, जानिए कुकुरदेव मंदिर का अनोखा रहस्य

भारतीय संस्कृति में आस्था और परंपराओं के कई अनोखे रंग देखने को मिलते हैं. लेकिन छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में एक ऐसा मंदिर स्थित है जो अपनी अनूठी मान्यता के कारण पूरी दुनिया के पर्यटकों और श्रद्धालुओं को हैरान कर देता है.

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रायपुर: भारतीय संस्कृति में आस्था और परंपराओं के कई अनोखे रंग देखने को मिलते हैं. लेकिन छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में एक ऐसा मंदिर स्थित है जो अपनी अनूठी मान्यता के कारण पूरी दुनिया के पर्यटकों और श्रद्धालुओं को हैरान कर देता है. जिला मुख्यालय के पास स्थित खपरी गांव में 'कुकुरदेव मंदिर' नाम का एक ऐतिहासिक धार्मिक स्थल है. इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां किसी पारंपरिक देवी-देवता की मुख्य मूर्ति नहीं, बल्कि एक वफादार कुत्ते की प्रतिमा स्थापित है, जिसकी ग्रामीण पूरी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करते हैं.

मंदिर परिसर की बनावट 

लगभग 200 मीटर के विस्तृत दायरे में फैले इस मंदिर परिसर की वास्तुकला बेहद आकर्षक है. जब कोई भी श्रद्धालु इस मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर कदम रखता है, तो स्वागत के लिए दोनों ओर पत्थरों को तराशकर बनाई गई कुत्तों की भव्य मूर्तियां दिखाई देती हैं. मंदिर के मुख्य गर्भगृह के भीतर एक कुत्ते की प्राचीन प्रतिमा स्थापित की गई है, और ठीक उसी के बगल में एक पवित्र शिवलिंग भी मौजूद है.

गर्भगृह का दृश्य

आमतौर पर देश के अन्य शिव मंदिरों में जो स्थान और सम्मान भगवान शिव के वाहन नंदी बैल को दिया जाता है, ठीक वही दर्जा इस अनोखे मंदिर में 'कुकुरदेव' को प्राप्त है. विशेष रूप से सावन के महीने में यहां भक्तों का तांता लगा रहता है, जो शिवलिंग पर जल चढ़ाने के साथ-साथ इस वफादार जानवर की भी समान रूप से पूजा करते हैं. स्थानीय लोगों का दृढ़ विश्वास है कि यहां श्रद्धापूर्वक दर्शन करने से कुकुरखांसी जैसी मौसमी बीमारियां दूर हो जाती हैं और क्षेत्र में किसी को भी आवारा कुत्तों के काटने का डर नहीं सताता.

मंदिर निर्माण के पीछे की लोककथा

इस अनोखे स्मारक रूपी मंदिर के निर्माण के पीछे छत्तीसगढ़ के लोक इतिहास में एक बेहद भावुक कहानी दर्ज है. सदियों पहले इस क्षेत्र में एक बंजारा अपने परिवार और एक बेहद चतुर पालतू कुत्ते के साथ आकर बसा था. वह कुत्ता स्वभाव से अपने मालिक के प्रति निष्ठा रखता था.

जब अकाल ने बदली परिस्थितियां

कुछ समय बाद इस पूरे इलाके में एक विनाशकारी अकाल पड़ा, जिससे बंजारे के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया. दाने-दाने को मोहताज बंजारे ने गांव के एक रसूखदार साहूकार से बड़ी रकम कर्ज पर ली. निर्धारित समय बीत जाने के बाद भी जब बंजारा गरीबी के कारण कर्ज की राशि नहीं लौटा पाया, तो साहूकार के दबाव के आगे बेबस होकर उसने अपने सबसे प्रिय और वफादार कुत्ते को साहूकार के पास गिरवी रख दिया.

कुत्ते की चतुराई ने जीता साहूकार का दिल

एक रात साहूकार के घर पर शातिर चोरों ने धावा बोल दिया और तिजोरी में रखे गहने और सारी धन-दौलत समेटकर ले गए. चोरों ने उस चोरी के माल को गांव के पास ही एक सुनसान मैदान में जमीन के नीचे दबा दिया. सुबह जब चोरी का पता चला तो साहूकार बदहवास हो गया.

कर्ज माफ कर उसे तुरंत आजाद किया

तभी उस समझदार कुत्ते ने साहूकार की धोती को अपने मुंह से पकड़ा और खींचते हुए उसे उसी सुनसान जगह पर ले गया. कुत्ते के इशारे पर जब वहां खुदाई की गई, तो साहूकार को अपना चोरी हुआ सारा कीमती सामान सुरक्षित वापस मिल गया. साहूकार ने उसका कर्ज माफ कर उसे तुरंत आजाद कर दिया. बाद में इसी बेजोड़ वफादारी को अमर बनाने के लिए ग्रामीणों ने इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया, जो आज भी इंसानों और जानवरों के अटूट रिश्ते का प्रतीक है. First Updated : Monday, 22 June 2026