नई दिल्ली: संसद के बजट सत्र के दौरान सोमवार को लोकसभा में अचानक ऐसा विवाद खड़ा हो गया, जिसने एक अप्रकाशित किताब को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया. यह किताब किसी राजनेता की नहीं, बल्कि पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की है. राहुल गांधी द्वारा सदन में इस किताब का हवाला दिए जाने पर सत्ता पक्ष ने कड़ा विरोध जताया और आखिरकार लोकसभा अध्यक्ष को हस्तक्षेप करना पड़ा.
इस पूरे घटनाक्रम के बाद सवाल उठने लगे कि आखिर जनरल नरवणे की किताब अब तक प्रकाशित क्यों नहीं हो सकी और संसद में उसका जिक्र करना संसदीय नियमों का उल्लंघन कैसे हो गया. साथ ही यह भी चर्चा तेज हो गई कि राहुल गांधी की सुई बार-बार इसी किताब पर क्यों अटक रही थी.
पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की किताब का नाम ‘Four Stars of Destiny’ है. यह एक संस्मरणात्मक किताब है, जिसमें उन्होंने अपने सैन्य जीवन के अनुभव साझा किए हैं. किताब में 2020 के भारत-चीन सीमा तनाव, पूर्वी लद्दाख में हुए सैन्य अभियानों, सरकार और सेना के बीच निर्णय लेने की प्रक्रिया और रणनीतिक सोच का उल्लेख किया गया है.
दिसंबर 2023 में इस किताब के कुछ अंश मीडिया में सामने आए थे. इन अंशों से संकेत मिला था कि चीन के साथ टकराव के दौरान हालात उतने 'नियंत्रण में' नहीं थे, जितना आधिकारिक तौर पर बताया गया. यही बिंदु इस किताब को संवेदनशील बनाता है, क्योंकि यह सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक फैसलों से जुड़ा हुआ माना गया.
किताब के अप्रकाशित रहने के पीछे कानूनी और प्रक्रियागत कारण बताए जा रहे हैं.
Army Rules, 1954 के सेक्शन 21 के तहत सेना से जुड़े विषयों या सुरक्षा मामलों पर बिना केंद्र सरकार की अनुमति कोई भी सामग्री प्रकाशित नहीं की जा सकती. इसमें सशस्त्र बलों की रणनीति, नीति, संचालन या सेना और सरकार के बीच निर्णय प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी शामिल होती है.
हालांकि Army Rules में सेवानिवृत्त अधिकारियों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं, लेकिन केंद्र सरकार के अन्य नियमों के अनुसार यदि कोई पूर्व अधिकारी सुरक्षा या खुफिया मामलों से जुड़ी जानकारी प्रकाशित करना चाहता है, तो उसे पूर्व अनुमति लेनी होती है.
इसी कारण पब्लिशर ने किताब के प्रकाशन के लिए रक्षा मंत्रालय और सरकार से अनुमति मांगी थी. समीक्षा प्रक्रिया लंबी चलने के चलते न तो अनुमति मिली और न ही किताब बाजार में आ सकी.
लोकसभा में बोलते हुए राहुल गांधी ने भारत-चीन सीमा विवाद पर सरकार के दावों को चुनौती दी. उन्होंने कहा कि पूर्व सेना प्रमुख की किताब में ऐसे तथ्य हैं, जो आधिकारिक बयानों से मेल नहीं खाते.
उन्होंने उसी किताब के अंशों का हवाला देने की कोशिश की, जो अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है. यहीं से विवाद शुरू हुआ. सत्ता पक्ष ने आपत्ति जताई कि किसी अप्रकाशित या अप्रमाणित स्रोत को संसद के रिकॉर्ड में शामिल नहीं किया जा सकता.
रक्षा मंत्री और गृह मंत्री ने इसे संसदीय नियमों का उल्लंघन बताया. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने व्यवस्था दी कि राहुल गांधी अप्रकाशित किताब या उससे जुड़े किसी लेख का हवाला नहीं देंगे. हंगामे के बाद सदन की कार्यवाही शाम 4 बजे तक स्थगित करनी पड़ी.
कार्यवाही दोबारा शुरू होने के बाद भी राहुल गांधी नरवणे की किताब का जिक्र करने की कोशिश करते रहे. उस समय सदन का संचालन कर रहे जगदंबिका पाल ने उन्हें रोका. इसके बाद बढ़ते हंगामे के चलते लोकसभा की कार्यवाही मंगलवार तक के लिए स्थगित कर दी गई.
सरकार का कहना था कि संसद में केवल वही सामग्री उद्धृत की जा सकती है, जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध, प्रकाशित और सत्यापित हो. चूंकि नरवणे की किताब आधिकारिक तौर पर प्रकाशित नहीं हुई है, इसलिए उसका हवाला देना संसदीय परंपरा के खिलाफ है.
लोकसभा अध्यक्ष ने भी कहा कि संसद का रिकॉर्ड किसी ऐसी सामग्री पर आधारित नहीं हो सकता, जो न तो आधिकारिक है और न ही सार्वजनिक रूप से उपलब्ध.
कांग्रेस और विपक्ष का आरोप है कि यह सिर्फ नियमों का मामला नहीं है, बल्कि असहज तथ्यों को दबाने की कोशिश है. विपक्ष का कहना है कि सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर उन सवालों से बच रही है, जो 2020 के चीन विवाद में उसकी भूमिका पर उठते हैं.
राहुल गांधी ने यह भी कहा कि अगर किताब में कुछ गलत या खतरनाक है, तो सरकार उसे सार्वजनिक करे और बहस होने दे, लेकिन वर्षों तक समीक्षा के नाम पर रोके रखना संदेह पैदा करता है.
बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने X पर पूर्व सेना प्रमुख के पुराने वीडियो क्लिप साझा किए. इन वीडियो में नरवणे कहते दिखते हैं कि भारत ने चीन के सामने अपनी जमीन का “एक इंच भी नहीं खोया” और सेना ने डोकलाम व लद्दाख में स्थिति को मजबूती से संभाला.
बीजेपी ने इन वीडियो के जरिए राहुल गांधी के आरोपों को भ्रामक बताते हुए उन पर संसद का समय बर्बाद करने का आरोप लगाया.
सरकारी तौर पर इस किताब पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं है. न ही ऐसा कोई आदेश है, जिसमें कहा गया हो कि किताब प्रकाशित नहीं की जा सकती. तकनीकी रूप से यह किताब ‘बैन’ नहीं है, बल्कि सरकारी समीक्षा और अनुमति की प्रक्रिया में अटकी हुई है.
भारत में इससे पहले भी कई पूर्व सेना प्रमुखों और वरिष्ठ अधिकारियों की किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें जनरल वीपी मलिक और जनरल वीके सिंह शामिल हैं. फर्क यह रहा है कि उनमें या तो रणनीतिक विवरण सीमित थे या वे पूरी तरह आत्मकथात्मक थीं. नरवणे की किताब में हालिया और संवेदनशील सैन्य-राजनीतिक घटनाओं का उल्लेख होने के कारण मामला जटिल माना जा रहा है.
यह विवाद सिर्फ एक किताब या एक भाषण तक सीमित नहीं है. यह राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक पारदर्शिता के बीच संतुलन, संसदीय नियमों और राजनीतिक बहस की सीमाओं पर बड़ा सवाल खड़ा करता है.
दरअसल, यह गलवान घाटी के सच से ज्यादा एक नैरेटिव वॉर बन चुका है, जिसमें हर पक्ष अपनी सियासी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहा है. First Updated : Tuesday, 03 February 2026