नई दिल्ली: हौज रानी स्थित फ्लोरिश स्टे में हुए भीषण अग्निकांड के बाद जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं. शुरुआती पड़ताल से पता चला है कि जिस लाइसेंस के आधार पर यह प्रतिष्ठान संचालित किया जा रहा था, उसके अधिकांश नियमों का उल्लंघन किया गया था. जिस जगह को सीमित संख्या में कमरों वाले बेड एंड ब्रेकफास्ट (बीएंडबी) के रूप में अनुमति मिली थी, वहां बड़े पैमाने पर होटल जैसी गतिविधियां चलाई जा रही थीं.
दरअसल, वर्ष 2007 में शुरू की गई बीएंडबी नीति का उद्देश्य पर्यटकों को अतिरिक्त आवास सुविधा उपलब्ध कराना था. इस योजना के तहत मकान मालिक अपने घर के कुछ कमरों को किराए पर दे सकता था, लेकिन इसके लिए कई शर्तें निर्धारित की गई थीं. नियमों के अनुसार मालिक का उसी परिसर में परिवार के साथ रहना अनिवार्य था और अधिकतम छह कमरे ही पर्यटकों को दिए जा सकते थे. साथ ही, किराए पर दिए जाने वाले कमरों की संख्या कुल कमरों के दो-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती थी.
जांच में सामने आया कि फ्लोरिश स्टे को केवल छह कमरों के संचालन की अनुमति थी, लेकिन वहां करीब 25 कमरे चलाए जा रहे थे. इससे यह स्पष्ट होता है कि लाइसेंस की निर्धारित सीमा से कई गुना अधिक व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही थीं. इतना ही नहीं, संपत्ति का उपयोग व्यावसायिक तौर पर होने के बावजूद बिजली और पानी की आपूर्ति घरेलू दरों पर ली जा रही थी, जिससे आर्थिक लाभ भी उठाया जा रहा था.
इस मामले ने विभिन्न सरकारी एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. नगर निगम, दिल्ली जल बोर्ड और बिजली वितरण कंपनी के पास ऐसे संकेत मौजूद होने चाहिए थे, जिनसे बढ़ी हुई गतिविधियों का पता चल सकता था. इसके बावजूद लंबे समय तक किसी स्तर पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई.
पुलिस की भूमिका को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है. पहले ऐसे प्रतिष्ठानों के संचालन के लिए पुलिस सत्यापन और मंजूरी आवश्यक होती थी, लेकिन वर्ष 2025 में नियमों में बदलाव के बाद यह प्रक्रिया समाप्त कर दी गई. इसके बाद निगरानी तंत्र पहले की तुलना में कमजोर पड़ गया.
फ्लोरिश स्टे हादसे ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर वर्षों से नियमों की अनदेखी कर चल रहे ऐसे प्रतिष्ठानों पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई. इस मामले ने प्रशासनिक निगरानी, जवाबदेही और सुरक्षा मानकों को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है. First Updated : Thursday, 04 June 2026