नई दिल्ली : राजधानी दिल्ली में आयोजित ग्लोबल एआई समिट में नवाचार और तकनीक के प्रदर्शन के बीच एक बड़ी फजीहत की खबर सामने आई है. गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने अपने पवेलियन में एक रोबोडॉग और सॉकर ड्रोन को 'इन-हाउस' उत्पाद के रूप में पेश किया, लेकिन सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे विदेशी उत्पाद बताकर पोल खोल दी. इस पूरे विवाद की मुख्य सूत्रधार प्रोफेसर नेहा सिंह बनी हुई हैं, जिनके दावों ने अब प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
आपको बता दें कि इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब डीडी न्यूज के एक वीडियो इंटरव्यू में प्रोफेसर नेहा सिंह ने बड़ी गर्मजोशी के साथ रोबोडॉग का प्रदर्शन किया. उन्होंने दावा किया कि यह अत्याधुनिक रोबोट खुद यूनिवर्सिटी के द्वारा ही बनाया गया है. हालांकि, इंटरनेट यूजर्स ने तुरंत ही ढूंढ निकाला कि यह असल में चीन से खरीदा गया उत्पाद है. इसके बाद एक अन्य वीडियो में सॉकर ड्रोन को भी अपना बताया गया, जो दक्षिण कोरियाई मूल का निकला. इस खुलासे ने यूनिवर्सिटी की भारी फजीहत कराई है.
विवादों के केंद्र में रहीं नेहा सिंह गलगोटिया यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में कम्युनिकेशन की फैकल्टी मेंबर हैं. उनके शैक्षणिक सफर की बात करें तो उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.कॉम और 2006 में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से एमबीए की डिग्री हासिल की है. नवंबर 2023 में गलगोटिया से जुड़ने से पहले वे शारदा यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर और करियर लॉन्चर में मेंटर के रूप में भी कार्यरत रही थीं. फिलहाल सोशल मीडिया पर उनका 'ओपन टू वर्क' वाला लिंक्डइन प्रोफाइल काफी वायरल हो रहा है.
वहीं, चारों तरफ से हो रही ट्रोलिंग और आलोचनाओं के बाद नेहा सिंह ने सार्वजनिक रूप से अपनी सफाई पेश की है. उन्होंने स्वीकार किया कि शायद वे बातों को स्पष्ट रूप से संवाद नहीं कर पाईं और वे इस पूरी घटना की जिम्मेदारी लेती हैं. प्रोफेसर ने कहा कि समिट के दौरान वे काफी अधिक जोश और ऊर्जा से भरी हुई थीं, जिसकी वजह से वे तकनीकी उत्पत्ति के बारे में सटीक जानकारी नहीं दे पाईं. उन्होंने इसे जानबूझकर गलत जानकारी देने के बजाय खराब संचार का परिणाम बताया है.
दूसरी तरफ, गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने अपनी साख बचाने के लिए इस पूरे विवाद का ठीकरा सीधे तौर पर प्रोफेसर नेहा सिंह पर ही फोड़ दिया है. यूनिवर्सिटी ने आधिकारिक बयान जारी कर माफी मांगी और इसे एक बड़ी 'गलतफहमी' करार दिया. बयान में कहा गया कि पवेलियन में मौजूद प्रतिनिधि को उत्पाद की तकनीकी बारीकियों का ज्ञान नहीं था. कैमरे के सामने आने के उत्साह में उन्होंने गलत जानकारी दी, जबकि उन्हें प्रेस से बात करने का कोई आधिकारिक अधिकार भी नहीं दिया गया था.
इस घटना ने शैक्षणिक संस्थानों द्वारा नवाचारों के नाम पर किए जाने वाले दावों की सत्यता पर एक नई बहस छेड़ दी है. विशेषज्ञों का मानना है कि किसी विदेशी उत्पाद को अपना बताकर पेश करना केवल एक व्यक्ति की गलती नहीं, बल्कि संस्थान के प्रबंधन की एक बड़ी चूक है. यूनिवर्सिटी भले ही इसे एक प्रतिनिधि का 'जोश' बता रही हो, लेकिन सोशल मीडिया पर लोग इसे अकादमिक बेईमानी के रूप में देख रहे हैं. अब देखना होगा कि संस्थान अपनी पारदर्शिता और साख को कैसे बहाल करता है. First Updated : Wednesday, 18 February 2026