कर्नाटक की राजनीति में राज्यपाल थावरचंद गहलोत और राज्य सरकार के बीच नया राजनीतिक विवाद सामने आया है. बजट सत्र की शुरुआत में आयोजित संयुक्त सत्र में गहलोत ने अपनी राजभाषण की केवल दो पंक्तियां पढ़ीं और बाकी भाषण को छोड़ दिया. यह भाषण राज्य सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं को दर्शाने के लिए तैयार किया गया था, लेकिन गहलोत ने इसमें शामिल कुछ अनुच्छेदों, विशेषकर मनरेगा सुधार कानून से संबंधित भागों, को सरकार की प्रचार सामग्री बताते हुए अस्वीकार कर दिया.
इस घटना से राज्य में राजनीतिक हलचल बढ़ गई है और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट में जाने पर विचार करने की बात कही है. इस घटनाक्रम के बाद सरकार और राज्यपाल के बीच सत्ता और संवैधानिक अधिकारों को लेकर बहस तेज हो गई है.
राज्यपाल के इस कदम ने कर्नाटक की राजनीति में नया मोड़ ला दिया है. इससे पहले तमिलनाडु और केरल में भी राज्यपालों द्वारा भाषण के कुछ हिस्सों को छोड़ने या पूरी तरह पढ़ने से इनकार करने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं. थावरचंद गहलोत ने विधानसभा और विधान परिषद के संयुक्त सत्र में पहुंचकर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, स्पीकर यू टी ख़ादर, विधान परिषद के चेयरमैन बसवराज होराट्टी और कानून एवं संसदीय मामलों के मंत्री एच के पाटिल द्वारा उनका स्वागत किया.
मुख्यमंत्री ने कहा कि हर साल नए साल पर राज्यपाल को संयुक्त सत्र में संबोधित करना होता है. यह संवैधानिक आवश्यकता है. आज राज्यपाल ने मंत्रिमंडल द्वारा तैयार भाषण पढ़ने के बजाय अपना भाषण पढ़ा. यह भारत के संविधान का उल्लंघन है. यह अनुच्छेद 176 और 163 का उल्लंघन है. हम राज्यपाल के रुख का विरोध करेंगे और सुप्रीम कोर्ट जाने पर विचार कर रहे हैं.
कर्नाटक मंत्री प्रियांक खार्गे ने कहा कि राज्यपाल का कार्यालय क्या भाजपा कार्यालय बन गया है? हमने भाषण में केवल तथ्य बताए हैं. इसमें कोई झूठ नहीं है, फिर भी राज्यपाल इसे पढ़ना नहीं चाहते. उन्होंने भाजपा नेताओं पर भी कटाक्ष किया.
राज्य सरकार ने राज्यपाल के भाषण से 11 अनुच्छेद हटाने का विरोध किया, जिसमें केंद्र सरकार और उसके नीतियों की आलोचना की गई थी, विशेषकर मनरेगा योजना और फंड के वितरण के मुद्दे पर. कानून और संसदीय मामलों के मंत्री एच के पाटिल ने कहा कि अनुच्छेद 176(1) के तहत यह राज्यपाल की जिम्मेदारी है कि वह मंत्रिमंडल द्वारा तैयार भाषण पूरी तरह पढ़ें. उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर राज्यपाल भाषण को छोटा कर देते हैं या नहीं पढ़ते हैं, तो यह संवैधानिक विश्वासघात होगा. First Updated : Thursday, 22 January 2026