चारा घोटाला मामले में लालू यादव को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, CBI की मांग ठुकराई, जमानत रहेगी बरकरार
देवघर चारा घोटाला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लालू यादव की जमानत बरकरार रखते हुए सीबीआई की अपील पर हस्तक्षेप से इनकार कर दिया. साथ ही अदालत ने झारखंड हाई कोर्ट को मामले की सुनवाई जल्द पूरी करने का निर्देश दिया.

नई दिल्ली: बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद यादव को देवघर चारा घोटाला मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. सर्वोच्च अदालत ने उनकी जमानत रद्द करने से इनकार करते हुए झारखंड हाई कोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया, जिसके तहत उन्हें जमानत दी गई थी. साथ ही कोर्ट ने इस लंबे समय से लंबित मामले का जल्द निपटारा करने पर जोर देते हुए हाई कोर्ट को अपील की सुनवाई में तेजी लाने का निर्देश दिया है.
मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति पीबी वराले की पीठ ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की उस याचिका पर कोई राहत नहीं दी, जिसमें लालू यादव की जमानत रद्द करने की मांग की गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह झारखंड हाई कोर्ट के जमानत आदेश में दखल नहीं देना चाहता. अदालत ने यह भी माना कि मामला काफी पुराना हो चुका है और ऐसे में अब अपील की सुनवाई को प्राथमिकता देना ज्यादा उचित होगा.
सात साल पुराने मामले का दिया हवाला
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीबीआई की यह अपील वर्ष 2018 से लंबित है और इस बीच लगभग सात साल का समय बीत चुका है. ऐसे हालात में जमानत रद्द करने के बजाय मूल अपील का जल्द निपटारा करना अधिक जरूरी है. अदालत ने संकेत दिया कि लंबे समय तक मामला लंबित रहने की स्थिति में केवल जमानत पर बहस करने के बजाय अंतिम निर्णय तक पहुंचना न्यायहित में होगा.
सीबीआई ने क्या रखा पक्ष?
सीबीआई की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एसवी राजू ने अदालत में दलील दी कि लालू यादव की जमानत याचिका पहले दो बार खारिज की जा चुकी थी. बाद में हाई कोर्ट ने उन्हें इस आधार पर जमानत दी कि उन्होंने अपनी सजा का 50 प्रतिशत हिस्सा पूरा कर लिया है. सीबीआई का कहना था कि यह आधार तथ्यात्मक रूप से सही नहीं था, क्योंकि अलग-अलग मामलों में दी गई सजाएं एक साथ नहीं चलतीं. एजेंसी ने तर्क दिया कि इस पहलू पर पर्याप्त विचार किए बिना जमानत दे दी गई थी.
लालू यादव की ओर से कपिल सिब्बल ने रखा पक्ष
लालू यादव की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 427 का संबंध सजाओं के एक साथ या अलग-अलग चलने से है. उनका तर्क था कि यह प्रावधान अंतिम फैसला सुनाए जाने के समय लागू होता है, न कि तब जब अदालत केवल सजा पर अंतरिम रोक या जमानत पर विचार कर रही हो. उन्होंने अदालत से कहा कि जमानत के चरण में इस प्रावधान को आधार बनाना उचित नहीं होगा.
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई जल्द पूरी करने पर दिया जोर
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने साफ संकेत दिया कि वह जमानत आदेश में बदलाव करने के बजाय मामले की अपील पर जल्द सुनवाई चाहती है. अदालत ने कहा कि यदि अपील की सुनवाई तेजी से पूरी कर ली जाए तो विवाद का स्थायी समाधान निकल सकता है. इसी वजह से कोर्ट ने झारखंड हाई कोर्ट को निर्देश दिया कि वह लालू यादव की लंबित अपील पर जल्द सुनवाई कर फैसला सुनाए.
पहले भी दे चुका था ऐसा संकेत
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं माना जा रहा है. इससे पहले फरवरी में हुई सुनवाई के दौरान भी अदालत ने संकेत दिया था कि वह लालू यादव की जमानत रद्द करने के पक्ष में नहीं है. उस समय भी पीठ ने कहा था कि लंबे समय से लंबित अपीलों का जल्द निपटारा करना अधिक महत्वपूर्ण है. अब ताजा आदेश में भी अदालत ने उसी रुख को दोहराते हुए जमानत बरकरार रखी और हाई कोर्ट को मामले की सुनवाई में तेजी लाने का निर्देश दिया.


