संसद का तीन दिवसीय विशेष सत्र आज से शुरू... सरकार पेश करेगी 3 अहम बिल, विपक्ष ने उठाए सवाल
संसद के विशेष सत्र में सरकार चुनावी ढांचे में बड़े बदलाव वाले तीन अहम विधेयक पेश करने जा रही है. महिला आरक्षण, परिसीमन और सीट बढ़ोतरी जैसे मुद्दों पर सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव के संकेत मिल रहे हैं.

सरकार ने गुरुवार से संसद का तीन दिवसीय विशेष सत्र बुलाने का फैसला किया है, जिसमें ऐसे अहम विधेयक पेश किए जाएंगे जो भारत की चुनावी व्यवस्था और प्रतिनिधित्व की संरचना को पूरी तरह बदल सकते हैं. इन प्रस्तावों को लेकर सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव तय माना जा रहा है, जिससे सत्र के दौरान जोरदार बहस और हंगामे की संभावना है.
सरकार इस विशेष सत्र में तीन महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा करेगी- संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026; परिसीमन विधेयक, 2026; और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026. इनका मुख्य उद्देश्य नई जनगणना के आंकड़ों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण करना, लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाना और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करना है.
महिलाओं के आरक्षण पर फोकस
इस सत्र का सबसे अहम मुद्दा महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में एक-तिहाई आरक्षण देने से जुड़ा है. यह कानून 2023 में पारित हो चुका है, लेकिन अब तक लागू नहीं हो पाया है क्योंकि इसे परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ा गया था. सरकार अब इसमें संशोधन कर इसे 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले लागू करना चाहती है. सरकार का मानना है कि यह कदम महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को मजबूत करेगा और उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में ज्यादा अवसर देगा.
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक क्या है
इस पूरे प्रस्ताव का केंद्र संविधान (131वां संशोधन) विधेयक है. इसके जरिए निर्वाचन क्षेत्रों के निर्धारण के आधार में बड़ा बदलाव किया जाएगा. अभी तक 1971 की जनगणना को आधार माना जाता था, लेकिन अब 2011 की जनगणना को आधार बनाने का प्रस्ताव है.
सरकार का कहना है कि पिछले कई दशकों में देश की जनसंख्या में काफी बदलाव हुआ है. शहरीकरण, पलायन और विकास के असमान स्तर के कारण अलग-अलग क्षेत्रों की जनसंख्या में अंतर बढ़ गया है. ऐसे में पुराने आंकड़ों के आधार पर प्रतिनिधित्व तय करना सही नहीं है. इस बदलाव से निर्वाचन क्षेत्रों का नया स्वरूप सामने आएगा और सीटों का पुनर्वितरण किया जा सकेगा.
परिसीमन विधेयक से क्या बदलेगा
परिसीमन विधेयक, 2026 इस पूरी प्रक्रिया का अगला महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसके तहत नए आंकड़ों के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण किया जाएगा. माना जा रहा है कि लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर करीब 850 तक हो सकती हैं. सीटों में इस बढ़ोतरी का मकसद बढ़ती जनसंख्या और आरक्षण की जरूरतों को संतुलित करना है. हालांकि, इससे राज्यों के बीच सीटों के बंटवारे में बदलाव आएगा, जिससे राजनीतिक संतुलन प्रभावित हो सकता है. सरकार का तर्क है कि बिना सीटें बढ़ाए आरक्षण लागू करना मुश्किल होगा, इसलिए यह कदम जरूरी है.
केंद्र शासित प्रदेश कानून में बदलाव
तीसरा विधेयक केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़ा है. केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 के तहत इन क्षेत्रों में सीटों के बंटवारे और आरक्षण को नए ढांचे के अनुसार व्यवस्थित किया जाएगा. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पूरे देश में एक समान प्रणाली लागू हो और सभी क्षेत्रों को नए नियमों के तहत समायोजित किया जा सके.
महिला आरक्षण: कानून से जमीन तक
महिला आरक्षण कानून, जिसे ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ भी कहा जाता है, 2023 में पारित हुआ था. लेकिन इसे लागू करने की शर्त अगली जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया से जुड़ी थी, जिससे इसके लागू होने में लंबा समय लग सकता था. अब सरकार इस प्रक्रिया को तेज करना चाहती है ताकि 2029 के चुनाव तक महिलाओं को इसका लाभ मिल सके. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी दलों से इस पहल का समर्थन करने की अपील की है. साथ ही सत्तारूढ़ दल ने अपने सांसदों को सत्र में मौजूद रहने के लिए व्हिप भी जारी किया है.
विपक्ष ने जताई गंभीर चिंताएं
इन प्रस्तावों को लेकर विपक्ष ने कई गंभीर चिंताएं जताई हैं. उनका कहना है कि परिसीमन के लिए 2011 की जनगणना का इस्तेमाल करना सही नहीं होगा. वे चाहते हैं कि 2021 की जनगणना के आंकड़े आने के बाद ही इस प्रक्रिया को शुरू किया जाए, जो संभवतः 2027 तक उपलब्ध होंगे.
विपक्षी दलों का यह भी कहना है कि इस प्रक्रिया से उत्तरी राज्यों को ज्यादा फायदा हो सकता है, जहां जनसंख्या तेजी से बढ़ी है. वहीं दक्षिणी राज्यों, जैसे तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है, जहां जनसंख्या वृद्धि स्थिर है. क्षेत्रीय दलों का मानना है कि इससे संघीय संतुलन बिगड़ सकता है और कुछ राज्यों की राजनीतिक ताकत कमजोर पड़ सकती है. इस मुद्दे पर विरोध जताने के लिए कुछ दलों ने प्रदर्शन की भी घोषणा की है.
सत्र के समय पर भी उठे सवाल
विपक्ष ने इस विशेष सत्र के समय और अवधि को लेकर भी सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि इतने बड़े संवैधानिक बदलावों को कम समय में और बिना पर्याप्त चर्चा के लाना जल्दबाजी है. कुछ नेताओं का यह भी मानना है कि महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना इसे लागू करने में देरी कर सकता है या इसे राजनीतिक विवाद का हिस्सा बना सकता है.


