देहरादून: उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के नगरासू गुरुद्वारे में निहंग सिखों के एक समूह और प्रशासन के बीच चल रहे विवाद के बाद एक बार फिर निहंग पंथ चर्चा में आ गया है. हाल की खबरों में इस विवाद पर ज्यादा फोकस किया गया है, लेकिन निहंग सिखों का इतिहास कई सदियों पुराना है. वे सिख धर्म की एक खास योद्धा परंपरा से जुड़े हैं और अपनी धार्मिक मान्यताओं, शस्त्रों और अलग पहचान के लिए जाने जाते हैं.
इस महीने की शुरुआत में कर्णप्रयाग में हुई झड़प के बाद गिरफ्तार किए गए अपने साथियों की रिहाई की मांग को लेकर करीब आधा दर्जन निहंग सिख नगरासू गुरुद्वारे की छत पर चढ़ गए थे.
पुलिस के मुताबिक, बातचीत के जरिए मामले को सुलझाने की कोशिश जारी है और सोमवार तक दो निहंग छत से नीचे उतर चुके हैं. प्रशासन का कहना है कि हेमकुंड साहिब यात्रा और गुरुद्वारे में होने वाली धार्मिक गतिविधियां सामान्य और शांतिपूर्ण तरीके से जारी हैं.
निहंग, जिन्हें अकाली निहंग भी कहा जाता है, सिख धर्म का एक पारंपरिक योद्धा समुदाय है. माना जाता है कि इसकी शुरुआत सिख गुरुओं के समय हुई, जब सिख समुदाय को आत्मरक्षा और युद्ध-कला के लिए तैयार किया गया था.
इतिहासकारों के अनुसार, इसकी नींव छठे सिख गुरु, गुरु हरगोबिंद ने रखी थी, जिसे बाद में 1699 में खालसा पंथ की स्थापना करने वाले गुरु गोबिंद सिंह ने और मजबूत किया."अकाली" शब्द का मतलब है "अमर" या "अकाल पुरुष से जुड़ा हुआ", जबकि "निहंग" का अर्थ निडर, निर्भय और हर समय युद्ध के लिए तैयार रहने वाले व्यक्ति से लगाया जाता है.निहंग सिख पारंपरिक रूप से सिख धर्म के रक्षक माने जाते हैं और उत्तर भारत में कई संघर्षों के दौरान उन्होंने अहम भूमिका निभाई है.
निहंग सिख अपनी गहरे नीले रंग की पोशाक, बड़ी पगड़ी और पारंपरिक हथियारों की वजह से आसानी से पहचाने जाते हैं. उनकी बड़ी पगड़ी को 'दमाला' कहा जाता है, जिस पर अक्सर 'चक्र' नाम के स्टील के छल्ले लगे होते हैं. तलवार, भाला और दूसरे पारंपरिक हथियार भी उनकी पहचान का अहम हिस्सा हैं. नीला रंग लंबे समय से खालसा की योद्धा परंपरा का प्रतीक माना जाता है. आज भी कई निहंग सिख वही पहनावा, रीति-रिवाज और जीवनशैली अपनाते हैं, जिन्हें वे सिख गुरुओं के समय के योद्धाओं की परंपरा मानते हैं.
18वीं सदी में, जब सिख समुदाय को कई हमलों और मुश्किलों का सामना करना पड़ा, तब निहंग सिखों ने अपनी अलग पहचान बनाई. निहंग छोटे-छोटे योद्धा दलों के रूप में लड़ते थे और कम संख्या में होने के बावजूद बड़ी सेनाओं का डटकर सामना करने के लिए जाने जाते थे. इतिहासकारों के मुताबिक, बाद में उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह के सिख साम्राज्य की सेना में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं.
अकाली फूला सिंह जैसे प्रसिद्ध निहंग नेताओं को उनके साहस, सैन्य अभियानों और सिख संस्थानों की रक्षा में निभाई गई भूमिका के लिए याद किया जाता है. समय के साथ निहंग सिख पारंपरिक युद्ध-कला और हथियारों की विरासत को संभालने वाले प्रमुख समुदाय बन गए। उन्होंने तलवारबाजी और अन्य पारंपरिक सिख युद्ध-कौशल को आज तक जीवित रखा है.
आज भी निहंग सिख, खासकर पंजाब में, सिख धर्म और धार्मिक जीवन का अहम हिस्सा हैं. बुद्ध दल और तरना दल जैसे अलग-अलग समूहों में बंटे निहंग धार्मिक जुलूसों, त्योहारों और पारंपरिक युद्ध-कला के प्रदर्शनों में हिस्सा लेते हैं. कई निहंग सेवा कार्य भी करते हैं और बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों की मदद करते हैं. हालांकि, निहंग सिख मुख्य रूप से अपनी धार्मिक और ऐतिहासिक परंपराओं को सहेजने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन कभी-कभी प्रशासन या कानून-व्यवस्था से जुड़े विवादों के कारण भी चर्चा में आ जाते हैं.उनकी अलग वेशभूषा, पारंपरिक हथियार और गौरवशाली इतिहास की वजह से लोगों का ध्यान अक्सर इस समुदाय की ओर आकर्षित होता है.
रुद्रप्रयाग गुरुद्वारे की घटना के बाद निहंग सिख एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं. यह मामला कर्णप्रयाग में स्थानीय लोगों के साथ हुई झड़प और उसके बाद चार निहंग सिखों की गिरफ्तारी से जुड़ा है. इस मामले में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए अधिकारियों ने जांच की जिम्मेदारी दूसरे अधिकारियों को सौंप दी है. साथ ही, पुलिस की कार्रवाई को लेकर लगाए गए आरोपों की अलग से जांच के भी आदेश दिए गए हैं. First Updated : Tuesday, 23 June 2026