तमिलनाडु चुनाव 2026: ब्राह्मण उम्मीदवारों से दूरी क्यों बना रहीं बड़ी पार्टियां? समझिए पूरा सियासी गणित
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में इस बार उम्मीदवारों की सूची ने सबका ध्यान खींचा है. बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने ब्राह्मण समुदाय को टिकट देने से दूरी बना ली है, जिसे बदलती सियासी रणनीति और वोट बैंक के नए समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है.

नई दिल्ली: तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हैं, लेकिन इस बार उम्मीदवारों की सूची में एक चौंकाने वाला ट्रेंड सामने आया है. राज्य की प्रमुख पार्टियों ने ब्राह्मण समुदाय के उम्मीदवारों को टिकट देने से लगभग दूरी बना ली है, जिसने सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है.
करीब 3 प्रतिशत आबादी वाले इस समुदाय की गैरमौजूदगी सिर्फ संयोग नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे बदलते वोट बैंक और राजनीतिक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. विश्लेषकों के मुताबिक यह राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत हो सकता है.
उम्मीदवारों की सूची में क्यों गायब हैं ब्राह्मण?
इस बार DMK, AIADMK, बीजेपी और कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों की लिस्ट में ब्राह्मण उम्मीदवार नजर नहीं आ रहे हैं. यह स्थिति पिछले कई दशकों के ट्रेंड से अलग है, जिससे साफ होता है कि पार्टियां अब नए सामाजिक समीकरणों के आधार पर रणनीति बना रही हैं.
AIADMK ने पहली बार नहीं उतारा कोई ब्राह्मण उम्मीदवार
करीब 35 साल में पहली बार AIADMK ने विधानसभा चुनाव में एक भी ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है. जयललिता के निधन के बाद से ही पार्टी में इस समुदाय की भागीदारी कम होती जा रही थी, जो अब लगभग खत्म होती दिख रही है.
BJP और अन्य दलों का भी यही रुख
भारतीय जनता पार्टी ने भी 27 सीटों में से किसी पर ब्राह्मण उम्मीदवार को मौका नहीं दिया. वहीं DMK और कांग्रेस ने भी इस समुदाय को नजरअंदाज किया है. हालांकि, तमिलगा वेत्रि कझगम (TVK) और नाम तमिलर कच्ची (NTK) ने कुछ ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है.
राजनीतिक विश्लेषकों ने बताई बड़ी वजह
विशेषज्ञों का मानना है कि ब्राह्मण मतदाताओं का झुकाव हाल के वर्षों में BJP की ओर बढ़ा है. ऐसे में AIADMK जैसी पार्टियों को अब इस समुदाय को टिकट देने में चुनावी फायदा नजर नहीं आ रहा.
एक विश्लेषक के अनुसार, "AIADMK ने दशकों तक ब्राह्मणों का समर्थन बनाए रखा था. लेकिन हाल के सालों में इसमें बदलाव आया है. जयललिता के निधन के बाद, ब्राह्मण मतदाता BJP की ओर चले गए हैं."
बदलते समीकरणों का असर
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से गैर-ब्राह्मण सशक्तिकरण पर आधारित रही है. यही वजह है कि कई पार्टियां अब उसी सामाजिक आधार को मजबूत करने पर फोकस कर रही हैं.
कुल मिलाकर, तमिलनाडु चुनाव 2026 में ब्राह्मण उम्मीदवारों की कमी सिर्फ एक चुनावी फैसला नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों और वोट बैंक की रणनीति का संकेत है. आने वाले समय में इसका असर चुनावी नतीजों पर भी देखने को मिल सकता है.


