EOS-09 भारत के लिए क्यों था अहम? 2025 में ISRO के दो अहम सैटेलाइट मिशन फेल

ISRO Mission Failed: ISRO को 2025 में दो अहम अंतरिक्ष मिशनों में झटका लगा है. EOS-09 और NVS-02 सैटेलाइट तकनीकी कारणों से सफल नहीं हो सके. ये मिशन भारत की रणनीतिक सुरक्षा और निगरानी के लिए बेहद जरूरी थे.

Shivani Mishra
Edited By: Shivani Mishra

ISRO Mission Failed: भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के लिए साल 2025 अब तक चुनौतीपूर्ण साबित हुआ है. इस वर्ष इसरो द्वारा किए गए दोनों प्रमुख अंतरिक्ष मिशन—NVS-02 और PSLV-C61/EOS-09—तकनीकी खामियों के कारण असफल हो गए हैं. इनमें से एक मिशन देश की सामरिक निगरानी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए था, जबकि दूसरा भारत की नौसेना और वायुसेना के लिए रणनीतिक संचार और नेविगेशन सहायता प्रदान करने के लिए था.

18 मई, रविवार को लॉन्च हुए PSLV-C61/EOS-09 मिशन को उड़ान भरने के महज आठ मिनट बाद रोक दिया गया. वहीं, इससे पहले फरवरी 2025 में लॉन्च हुआ NVS-02 उपग्रह भी अपनी निर्धारित कक्षा में नहीं पहुंच पाया था. इन दोनों असफलताओं ने न केवल इसरो की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि भारत की सुरक्षा और निगरानी योजनाओं को भी झटका दिया है.

PSLV-C61/EOS-09 मिशन क्यों था खास?

EOS-09 उपग्रह को पहले RISAT (Radar Imaging Satellite) के नाम से जाना जाता था. यह एक ऐसा रडार इमेजिंग उपग्रह है जो दिन-रात और हर मौसम में कार्य करने में सक्षम है. यह पारंपरिक ऑप्टिकल सैटेलाइट की तरह रंगीन फोटो नहीं लेता, बल्कि पृथ्वी की सतह से रडार तरंगें टकराकर जो परावर्तित होती हैं, उन्हें प्रोसेस करके इमेज बनाता है.

इस सैटेलाइट की खासियत यह थी कि यह बादलों और अंधेरे में भी दुश्मनों की गतिविधियों पर नजर रखने में सक्षम था. इसका वजन 1700 किलोग्राम था और इसे कम से कम पांच साल की परिचालन अवधि के लिए तैयार किया गया था. यह उपग्रह 18 मिनट में अपनी निर्धारित कक्षा में स्थापित होना था, लेकिन तीसरे चरण में तकनीकी खामी आने के कारण मिशन अधूरा रह गया.

देश की सीमाओं पर निगरानी के लिए था महत्वपूर्ण

EOS-09 जैसे उपग्रह खासतौर पर भारत की 7,500 किमी लंबी समुद्री सीमा और 15,000 किमी से अधिक लंबी स्थलीय सीमा की निगरानी के लिए अत्यंत जरूरी माने जाते हैं. अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद ISRO प्रमुख ने कहा था कि भारत को अपनी सीमाओं की सतत निगरानी के लिए 100–150 उपग्रहों की जरूरत है.

इस मिशन की लॉन्चिंग की तैयारियां मार्च से ही शुरू हो चुकी थीं, जो इस बात को दर्शाता है कि इसका उद्देश्य पूरी तरह रणनीतिक था. खास बात यह है कि इस मिशन की लॉन्चिंग ऐसे समय हुई, जब भारत और पाकिस्तान के बीच तीन दिन तक चले तनाव के बाद सीज़फायर की घोषणा की गई थी.

PSLV का रिकॉर्ड 

PSLV यानी पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल इसरो का सबसे अधिक बार उड़ान भरने वाला रॉकेट है. अब तक इस रॉकेट के 63 मिशनों में से यह तीसरा असफल प्रयास रहा है. इससे पहले इस रॉकेट के जरिए 200 से अधिक भारतीय और विदेशी उपग्रह सफलतापूर्वक लॉन्च किए जा चुके हैं.

18 मई को हुए लॉन्च के समय भारतीय संसद की विज्ञान और प्रौद्योगिकी स्थायी समिति के कई सांसद भी श्रीहरिकोटा में मौजूद थे, जिन्होंने इसरो की 101वीं लॉन्चिंग देखी.

स्वदेशी नेविगेशन और रणनीतिक संचार के लिए अहम NVS-02

फरवरी 2025 में इसरो ने जानकारी दी थी कि NVS-02 उपग्रह अपनी प्रारंभिक कक्षा में ही अटका हुआ है और उसे अपनी निर्धारित कक्षा तक पहुंचाना संभव नहीं हो पाया है. इस सैटेलाइट को 29 जनवरी को GSLV-Mk2 रॉकेट के ज़रिए लॉन्च किया गया था. यह इसरो का 100वां मिशन था.

इस उपग्रह का उद्देश्य भारत के लिए स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम विकसित करना और सैन्य अभियानों के लिए सुरक्षित रणनीतिक संचार सुनिश्चित करना था. लेकिन इसके लिक्विड फ्यूल इंजन में इलेक्ट्रिक वॉल्व की तकनीकी खराबी के कारण इसे अपनी सही कक्षा में नहीं पहुंचाया जा सका.

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