पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) ने अब फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की निगरानी से बचने के लिए अपनी फंडिंग प्रणाली को डिजिटल रूप दे दिया है. इस आतंकी संगठन ने पाकिस्तान के डिजिटल वॉलेट प्लेटफॉर्म जैसे ईज़ीपैसा और सदापे का इस्तेमाल कर करीब 3.91 अरब पाकिस्तानी रुपये जुटाने की योजना चलाई है.
FATF की ग्रे लिस्ट से बाहर आने के लिए पाकिस्तान ने 2019 में दावा किया था कि उसने जैश पर कड़ा शिकंजा कसा है. इसमें मसूद अजहर और उसके भाइयों के बैंक खातों पर निगरानी, कैश लेन-देन और चंदा इकट्ठा करने के पारंपरिक तरीकों पर प्रतिबंध जैसी बातें शामिल थीं. लेकिन हकीकत यह है कि JeM अब बैंकिंग नेटवर्क से बाहर डिजिटल माध्यमों का सहारा लेकर आतंक की फंडिंग जारी रखे हुए है.
7 मई को भारतीय सेना द्वारा चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर में जैश के कई आतंकी ट्रेनिंग सेंटरों को नष्ट कर दिया गया था. इसमें मुख्यालय 'मरकज़ सुभानअल्लाह' समेत चार अन्य ट्रेनिंग कैंप भी शामिल थे. इस नुकसान की भरपाई के लिए संगठन ने 313 नए मरकज़ बनाने की योजना बनाई और इसके लिए डिजिटल माध्यम से पैसे जुटाने की मुहिम शुरू की गई.
फेसबुक और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म्स पर दान मांगने वाले पोस्टर्स, वीडियो और मसूद अजहर का हस्तलिखित पत्र प्रसारित किया जा रहा है. इन संदेशों में समर्थकों से हर मरकज़ के लिए 1.25 करोड़ पाकिस्तानी रुपये दान करने की अपील की जा रही है. लक्ष्य है – कुल 391 करोड़ रुपये जुटाना.
जांच में सामने आया कि ये पैसे सीधे डिजिटल वॉलेट्स में भेजे जा रहे हैं, जिनमें से कई मसूद अजहर के परिवार से जुड़े हैं. जैसे उसका भाई तल्हा अल सैफ़, बेटा हम्माद अजहर और हरिपुर जिले के आतंकी आफताब अहमद से जुड़े वॉलेट्स.
JeM ने लगभग 2,000 से अधिक डिजिटल वॉलेट्स बना रखे हैं. संगठन हर महीने करीब 30 नए वॉलेट्स एक्टिव करता है, जिससे फंड का सोर्स ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है. एक वॉलेट से बड़ी रकम दूसरे वॉलेट्स में छोटे हिस्सों में ट्रांसफर की जाती है और फिर एजेंटों के जरिए नकद निकासी कर ली जाती है.
साइबर विशेषज्ञों के मुताबिक, EasyPaisa और SadaPay जैसे वॉलेट्स बैंकिंग प्रणाली से बाहर काम करते हैं, जिससे लेन-देन को FATF की निगरानी से बचाया जा सकता है.
JeM की 80% फंडिंग अब डिजिटल चैनलों से होती है. हर साल 80–90 करोड़ रुपये के लेन-देन इस माध्यम से किए जाते हैं. इस धन का इस्तेमाल हथियार खरीद, आतंकी ट्रेनिंग कैंप संचालन, प्रचार प्रसार, लग्जरी सामान और मसूद अजहर के परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने में होता है. बड़ी राशि खाड़ी देशों से आती है.
गाज़ा के नाम पर भी दान मांगा जाता है, जबकि उसका असल उपयोग आतंकी गतिविधियों में होता है. कुछ वॉलेट्स गाज़ा से जुड़े दिखाए गए हैं, लेकिन संचालन जैश के ही आतंकी करते हैं.
सूत्रों के अनुसार, इन नए 313 मरकज़ का असली उद्देश्य दोहरा है:
1. लश्कर-ए-तैयबा जैसे नेटवर्क की नकल करना और ट्रेनिंग सेंटरों को पूरे देश में फैलाना ताकि भविष्य में किसी भी सैन्य ऑपरेशन से कम नुकसान हो.
2. मसूद अजहर और उसके परिवार के लिए सुरक्षित आश्रय तैयार करना, जिससे वे हमलों से बच सकें.
3. इनमें से 3-4 बड़े मरकज़ को आश्रय के रूप में, कुछ को ट्रेनिंग सेंटर और बाकी को रसद सहायता के लिए इस्तेमाल किया जाना है.
JeM का दावा है कि हर मरकज़ पर करीब 1.25 करोड़ रुपये खर्च होंगे, जबकि हकीकत में छोटे सेंटरों पर इससे कहीं कम खर्च आता है. विशेषज्ञों का मानना है कि कुल लागत करीब 123 करोड़ रुपये होगी, जिससे बची राशि का इस्तेमाल हथियारों के लिए किया जा सकता है.
भारतीय एजेंसियां इस पूरे डिजिटल नेटवर्क पर करीबी नजर बनाए हुए हैं. कई वॉलेट्स, मोबाइल नंबर और खातों की पहचान हो चुकी है. परंतु पाकिस्तान की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सरकारी संरक्षण के बिना इस स्तर पर फंडिंग संभव नहीं. First Updated : Thursday, 21 August 2025