'डील बस होने ही वाली थी...', ईरान ने अमेरिका पर फोड़ा वार्ता फेल होने का ठीकरा

ईरान और अमेरिका के बीच इस्लामाबाद में हुई अहम वार्ता आखिरी वक्त पर फेल हो गई. ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने खुलासा किया कि दोनों देश समझौते के बेहद करीब थे, लेकिन अमेरिका द्वारा शर्तें बदलने से यह डील टूट गई.

Yogita Pandey
Edited By: Yogita Pandey

नई दिल्ली: ईरान और अमेरिका के बीच इस्लामाबाद में हुई अहम वार्ता किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी. दोनों देशों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए, अमेरिका का कहना है कि ईरान उसकी शर्तों को मानने के लिए तैयार नहीं था, जबकि ईरान ने पलटवार करते हुए कहा कि अमेरिका ने ऐसी मांगें रखीं जिन्हें वह युद्ध के दौरान हासिल नहीं कर पाया.

इस बीच ईरान के शीर्ष नेताओं के बयानों से एक बड़ा खुलासा हुआ है. राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और विदेश मंत्री सैय्यद अब्बास अराघची ने संकेत दिया कि दोनों देश समझौते के बेहद करीब पहुंच चुके थे, लेकिन अंतिम समय में हालात बदल गए और यह मौका हाथ से निकल गया.

'इस्लामाबाद डील' से कुछ कदम दूर थे दोनों देश

ईरान के विदेश मंत्री सैय्यद अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जानकारी देते हुए बताया कि पिछले 47 वर्षों में पहली बार दोनों देशों के बीच इतने उच्च स्तर पर गहन बातचीत हुई थी. उनके अनुसार, यह वार्ता इतनी आगे बढ़ चुकी थी कि दोनों पक्ष 'इस्लामाबाद एमओयू' पर हस्ताक्षर करने के बेहद करीब थे.

उन्होंने कहा कि ईरान ने पूरी ईमानदारी और सकारात्मक सोच के साथ बातचीत में हिस्सा लिया और शांति स्थापित करने की दिशा में गंभीर प्रयास किए.

अंतिम समय पर बदली अमेरिका की रणनीति

अराघची ने कहा कि जब समझौता लगभग तय हो चुका था, तभी अमेरिका ने अचानक अपनी शर्तों में बदलाव कर दिया. उनके मुताबिक, अमेरिका ने बातचीत के नियमों को बदलते हुए नई मांगें जोड़ दीं और प्रक्रिया में बाधाएं उत्पन्न कीं.

उन्होंने तंज भरे लहजे में कहा कि अमेरिका ने इतिहास से "जीरो सबक" लिया है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सद्भावना का जवाब सद्भावना से ही दिया जा सकता है, जबकि दुश्मनी का परिणाम भी दुश्मनी ही होता है.

राष्ट्रपति पेजेश्कियान का सख्त रुख

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका अपनी "तानाशाही" मानसिकता को छोड़ दे और ईरान के अधिकारों का सम्मान करे, तो समझौते की राह आसान हो सकती है.

उन्होंने यह भी साफ किया कि ईरान बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन अपने सम्मान और अधिकारों से समझौता नहीं करेगा. साथ ही उन्होंने वार्ता में शामिल ईरानी प्रतिनिधिमंडल की सराहना की और संसद अध्यक्ष डॉ. गलिबाफ को अपना “प्रिय भाई” बताया.

'शिफ्टिंग गोलपोस्ट' बना सबसे बड़ा कारण

अराघची के अनुसार, समझौता न हो पाने की सबसे बड़ी वजह अमेरिका का बार-बार अपनी शर्तों को बदलना रहा. उन्होंने इसे 'शिफ्टिंग गोलपोस्ट' करार दिया. ईरान का मानना है कि उसने अपनी ओर से लचीलापन दिखाया, लेकिन अमेरिका की 'मैक्सिमलिस्ट' सोच ने इस ऐतिहासिक अवसर को विफल कर दिया.

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