ट्रंप की नीतियों से भड़का जर्मनी, अमेरिकी सैनिकों को बाहर करने की मांग

डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों, खासकर जर्मनी, के बीच तनाव बढ़ गया है. जर्मनी में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी और नीतियों को लेकर विरोध तेज हो रहा है, जिससे नाटो में भी दरार के संकेत दिख रहे हैं.

Suraj Mishra
Edited By: Suraj Mishra

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद उसके पारंपरिक सहयोगी देशों के साथ रिश्तों में खटास बढ़ती दिखाई दे रही है. नाटो के कई सदस्य देश अब खुलकर वॉशिंगटन की नीतियों पर सवाल उठा रहे हैं. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका का करीबी सहयोगी रहा जर्मनी भी अब विरोध के स्वर तेज कर रहा है.

अमेरिकी सैन्य उपस्थिति पर आपत्ति

जर्मनी की दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AFD) ने देश में मौजूद अमेरिकी सैन्य उपस्थिति पर आपत्ति जताई है. पार्टी ने जर्मन सरकार से मांग की है कि वह अपनी विदेश नीति को अमेरिका से स्वतंत्र बनाए और देश में तैनात लगभग 40 हजार अमेरिकी सैनिकों को वापस भेजे. पार्टी के नेता टीनो च्रुपाला ने कहा कि जर्मनी को अपने यहां मौजूद विदेशी सैन्य अड्डों और परमाणु हथियारों को भी समाप्त करना चाहिए.

दरअसल, लंबे समय से यूरोपीय देशों के बीच यह धारणा बनी हुई है कि नाटो में अमेरिका अपने हितों को प्राथमिकता देता है. कई देशों का मानना है कि अमेरिका उन्हें अनावश्यक रूप से विदेशी संघर्षों में शामिल करता है. विशेष रूप से ईरान से जुड़े तनाव को लेकर जर्मनी में असंतोष बढ़ा है. जर्मन नेतृत्व का आरोप है कि अमेरिका ने हालात शांत करने के बजाय उन्हें और जटिल बनाया है, जिससे वैश्विक तनाव बढ़ा है.

जर्मनी में कितने अमेरिकी सैनिक तैनात?

रिपोर्ट्स के अनुसार जर्मनी में अमेरिका के 40 हजार से अधिक सैनिक तैनात हैं और यहां एक दर्जन से ज्यादा सैन्य अड्डे मौजूद हैं. रामस्टाइन एयरबेस इनमें सबसे प्रमुख है, जहां से कई सैन्य अभियानों का संचालन किया जाता है. इस वजह से जर्मनी को आशंका है कि वह संभावित हमलों का निशाना बन सकता है.

पिछले एक वर्ष में अमेरिका और जर्मनी के संबंधों में लगातार तनाव बढ़ा है. ऐसी खबरें भी सामने आई हैं कि ट्रंप प्रशासन जर्मनी से सैनिकों की वापसी पर विचार कर रहा है, हालांकि इस पर अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.

ट्रंप के हालिया बयानों से सहयोगी देश असहज

ट्रंप के हालिया बयानों और नीतियों ने अन्य सहयोगी देशों को भी असहज किया है. उन्होंने कई मौकों पर यूरोपीय नेताओं की आलोचना की है और यहां तक कि सहयोगी देशों से रक्षा खर्च बढ़ाने की मांग भी की है. ट्रंप का कहना है कि यदि यूरोपीय देश अपनी सुरक्षा पर अधिक खर्च नहीं कर सकते, तो उन्हें अपनी रक्षा की जिम्मेदारी स्वयं उठानी चाहिए.

इन परिस्थितियों ने दशकों पुरानी अमेरिकी विदेश नीति और नाटो जैसे गठबंधन के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं. विश्लेषकों का मानना है कि यदि यही स्थिति जारी रही, तो अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच दूरी और बढ़ सकती है.

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