अमेरिका और इजरायल लगातार यह कहते रहे कि उनका मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना है। लेकिन जमीनी हकीकत अब एक अलग कहानी बता रही है। हमलों के बाद हालात ऐसे बने हैं जहां यह सवाल उठ रहा है कि क्या इन हमलों ने खतरे को कम किया है। या फिर उल्टा इसे और ज्यादा बढ़ा दिया है।
एक महीने तक चले इस युद्ध ने ईरान की रणनीति को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। पहले जहां संयम की नीति अपनाई जा रही थी। वहीं अब अंदरखाने नई सोच जन्म ले रही है। यह सोच सुरक्षा के लिए परमाणु विकल्प को जरूरी मानने लगी है। यही बदलाव सबसे बड़ा संकेत माना जा रहा है।
ईरान लंबे समय तक यह कहता रहा कि वह परमाणु बम नहीं बनाना चाहता। धार्मिक आधार पर भी इसे गलत बताया गया था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। युद्ध के बाद वही पुरानी लाइन कमजोर पड़ती दिख रही है। इससे नीति में बदलाव की संभावना बढ़ गई है।
ईरान के पास पहले से ऐसी तकनीक और संवर्धित यूरेनियम मौजूद है। जिससे परमाणु हथियार बनाया जा सकता है। अब तक उसने खुद को रोके रखा था। लेकिन लगातार हमलों ने उसे उस दिशा में तेजी से सोचने पर मजबूर कर दिया है। इससे यह खतरा और ज्यादा वास्तविक लगता है।
इस पूरे संघर्ष ने वह संतुलन तोड़ दिया है। जो सालों से बना हुआ था। सैन्य हमलों ने कार्यक्रम को खत्म करने के बजाय उसे और मजबूत बना दिया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि दबाव जितना बढ़ेगा। उतना ही परमाणु कार्यक्रम तेजी से आगे बढ़ेगा।
ईरान के अंदर अब कई प्रभावशाली आवाजें खुलकर परमाणु हथियार के समर्थन में सामने आ रही हैं। यह वही देश है जहां पहले इसे धार्मिक रूप से गलत बताया जाता था। लेकिन अब हालात ऐसे बन रहे हैं। जहां यह मांग खुले मंच पर उठ रही है। नीति बदलने की जमीन तैयार हो रही है।
कई विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका का यह कदम उल्टा पड़ सकता है। क्योंकि दबाव और हमलों ने ईरान को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है। कि बिना परमाणु ताकत के वह खुद को सुरक्षित नहीं रख सकता। यही सोच भविष्य में बड़ा संकट बन सकती है। First Updated : Monday, 30 March 2026