नई दिल्ली: मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान एक मुश्किल कूटनीतिक स्थिति में फंसता नजर आ रहा है. एक ओर उसने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कराने में अहम भूमिका निभाई है, तो दूसरी ओर सऊदी अरब के साथ उसका रक्षा समझौता उसे खुलकर रियाद के समर्थन में खड़ा होने की जिम्मेदारी भी देता है. ऐसे में यदि ईरान और सऊदी अरब के बीच सीधा टकराव होता है, तो पाकिस्तान के लिए तटस्थ रहना बेहद कठिन हो सकता है.
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने जून में अमेरिका और ईरान के बीच अंतरिम समझौते की दिशा में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी. वहीं सितंबर 2025 में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच पारस्परिक रक्षा समझौता हुआ था. इस समझौते के तहत हजारों पाकिस्तानी सैनिक और एक लड़ाकू विमान स्क्वाड्रन पहले से ही सऊदी अरब में तैनात हैं.
एक पाकिस्तानी अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि इस्लामाबाद ने ईरान को स्पष्ट संदेश दिया है कि सऊदी अरब पर हमला, पाकिस्तान पर हमला माना जाएगा. इस बयान के बाद पाकिस्तान की निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं. यदि सऊदी की सुरक्षा उसकी प्राथमिकता है, तो ईरान के साथ निष्पक्ष बातचीत कराना उसके लिए आसान नहीं होगा.
हाल ही में यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर मिसाइल हमले किए. हूतियों का आरोप है कि सऊदी सेना ने उनके नियंत्रण वाले एयरपोर्ट पर बमबारी की थी. इस घटना के बाद चार वर्षों से जारी संघर्ष विराम टूट गया और पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ गया.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संघर्ष और बढ़ा तो यमन सीमा के पास तैनात पाकिस्तानी सैनिक भी इसकी चपेट में आ सकते हैं. इसके अलावा लाल सागर में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से पाकिस्तान के व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है. पहले भी होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के दौरान पाकिस्तान को ईंधन संकट जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा था.
विश्लेषकों का मानना है कि सऊदी अरब अब केवल अमेरिका पर सुरक्षा के लिए निर्भर नहीं रहना चाहता. यही वजह है कि उसने पाकिस्तान जैसे सहयोगी देशों के साथ रक्षा साझेदारी को मजबूत किया है, लेकिन यही साझेदारी अब पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक चुनौती बनती जा रही है. First Updated : Friday, 17 July 2026