ईरान-US वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल, अमेरिकी विश्लेषक ने दी चेतावनी

अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता में पाकिस्तान की मध्यस्थता को लेकर विवाद गहराता जा रहा है. एक अमेरिकी विशेषज्ञ ने इसे जोखिम भरा बताया है, जिससे कूटनीतिक प्रयासों और क्षेत्रीय संतुलन पर सवाल खड़े हो गए हैं.

Shraddha Mishra

पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की कोशिशें एक नए विवाद में घिर गई हैं. इस बार चर्चा का केंद्र पाकिस्तान है, जो इन दोनों देशों के बीच मध्यस्थ बनने की तैयारी कर रहा है. जहां एक ओर इसे कूटनीतिक पहल के तौर पर देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञ इसे गंभीर जोखिम मान रहे हैं. इसी मुद्दे पर अमेरिका के एक वरिष्ठ विश्लेषक ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है, जिससे यह बहस और तेज हो गई है.

अमेरिका के थिंक टैंक अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो माइकल रुबिन ने पाकिस्तान की मध्यस्थता पर सख्त आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि पाकिस्तान की यह भूमिका अमेरिका के लिए शर्मिंदगी का कारण बन सकती है और इससे सुरक्षा संबंधी खतरे भी पैदा हो सकते हैं. यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की वार्ता आयोजित कराने की तैयारी में लगा हुआ है.

पुराने रिकॉर्ड को लेकर आलोचना

संडे गार्जियन में प्रकाशित अपने लेख में रुबिन ने पाकिस्तान के पिछले रिकॉर्ड पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की नीतियां हमेशा से विवादों में रही हैं. उन्होंने उदाहरण देते हुए लिखा कि पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक ए.क्यू. खान पर ईरान के परमाणु कार्यक्रम में मदद करने के आरोप लगे थे. ऐसे में उनका कहना है कि अब उसी देश को मध्यस्थ बनाना सही नहीं है. रुबिन ने यह भी आरोप लगाया कि पाकिस्तान उन देशों में शामिल है जहां अमेरिका और यहूदियों के खिलाफ भावना ज्यादा देखी जाती है.

अमेरिकी कार्रवाई पर पाकिस्तान के रुख का जिक्र

रुबिन ने पाकिस्तान के उस पुराने रुख का भी जिक्र किया, जब अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन के खिलाफ कार्रवाई की थी. उन्होंने कहा कि उस समय पाकिस्तान सरकार ने इस ऑपरेशन पर नाराजगी जताई थी. उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ व्यक्तिगत रिश्तों के आधार पर किसी देश पर भरोसा करना ठीक नहीं है. उनके मुताबिक, इस तरह के फैसले भविष्य में बड़ी समस्या पैदा कर सकते हैं.

ट्रंप के फैसले को बताया गलत

रुबिन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फैसले को भी गलत करार दिया. उनका कहना है कि पाकिस्तान पर भरोसा करना वही पुरानी गलतियां दोहराने जैसा है, जो पहले अफगानिस्तान, गाजा, सीरिया और यमन जैसे क्षेत्रों में हो चुकी हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका अपने विरोधियों को ही बातचीत की जिम्मेदारी देगा, तो इससे हालात और बिगड़ सकते हैं. ऐसे समझौते अमेरिका की स्थिति को कमजोर कर सकते हैं और विरोधियों को मजबूत बना सकते हैं.

भारत का भी किया जिक्र

अपने लेख में रुबिन ने भारत का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि भारत को सतर्क रहने की जरूरत है और उसे यह समझना चाहिए कि पाकिस्तान इस भूमिका तक कैसे पहुंचा. उनका मानना है कि अगर किसी देश को मध्यस्थ बनाना ही था, तो भारत इस भूमिका के लिए ज्यादा उपयुक्त विकल्प हो सकता था.

ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव

इस बीच, डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को कहा कि अमेरिकी प्रतिनिधि ईरान के साथ दूसरे दौर की बातचीत के लिए पाकिस्तान जाएंगे. उन्होंने ईरान को चेतावनी भी दी कि अगर वह प्रस्तावित समझौते को स्वीकार नहीं करता है, तो अमेरिका उसके नागरिक ढांचे पर हमला कर सकता है.

हालांकि, खबरें यह भी हैं कि ईरान ने इस दूसरे दौर की वार्ता में शामिल होने से मना कर दिया है. ऐसे में बातचीत की संभावना कमजोर पड़ती नजर आ रही है. युद्धविराम की अवधि 22 अप्रैल को खत्म होने वाली है, और अगर तब तक कोई समाधान नहीं निकला, तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है.

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