नई दिल्ली: अमेरिका और चीन के बीच पहले से चला आ रहा तनाव एक बार फिर बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है. इस बार वजह है ताइवान. अमेरिका के चार सांसदों का प्रस्तावित ताइवान दौरा चीन को भड़का सकता है. खास बात यह है कि यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगले कुछ हफ्तों में चीन जाकर राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात करने वाले हैं.
इस अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल में डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों दलों के सांसद हैं. टीम में जीन शाहीन, जॉन कर्टिस, थॉम टिलिस और जैकी रोसेन शामिल हैं. इनका मुख्य उद्देश्य एशिया में अमेरिका के प्रमुख सहयोगी देशों ताइवान, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ संबंधों को और मजबूत करना है.
दौरे का सबसे अहम और विवादास्पद पड़ाव ताइवान है. चीन ताइवान को अपना अभिन्न अंग मानता है और किसी भी विदेशी राजनेता के वहां जाने को अपनी संप्रभुता पर हमला समझता है. ऐसे में अमेरिकी सांसदों का यह दौरा बीजिंग के लिए सीधी चुनौती की तरह है.
ताइवान लंबे समय से अमेरिका और चीन के बीच सबसे बड़ा विवाद का मुद्दा रहा है. अमेरिका ताइवान को एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक देश के रूप में देखता है और उसे सैन्य तथा आर्थिक मदद देता है. वहीं चीन “एक चीन नीति” के तहत ताइवान को अपना हिस्सा बताता है और जरूरत पड़ने पर बल प्रयोग की धमकी भी देता रहा है.
ट्रंप चीन के साथ बड़े व्यापारिक और कूटनीतिक समझौते की तैयारी कर रहे हैं. ऐसे में सांसदों का ताइवान जाना बीजिंग को उकसाने वाला कदम माना जा रहा है. मानना है कि शी जिनपिंग इस मुद्दे को ट्रंप से मुलाकात के दौरान जोर-शोर से उठा सकते हैं और अमेरिका पर दबाव बनाने की कोशिश करेंगे.
इस दौरे को अमेरिका की रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है. मध्य पूर्व में चल रही जंग के कारण अमेरिका का ध्यान एशिया से कुछ हद तक हटता दिख रहा है. इससे जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देश चिंतित हैं कि चीन इस मौके का फायदा उठाकर अपनी दादागिरी बढ़ा सकता है. सांसदों का दौरा इन सहयोगी देशों को अमेरिकी समर्थन का भरोसा दिलाने का प्रयास है.
ताइवान दुनिया की अग्रणी सेमीकंडक्टर चिप उद्योग का केंद्र है. अमेरिका समेत कई देश चिप सप्लाई के लिए ताइवान पर निर्भर हैं. अगर ताइवान को लेकर तनाव बढ़ा तो वैश्विक तकनीकी और व्यापार पर बुरा असर पड़ सकता है.
पिछले अनुभव बताते हैं कि जब भी अमेरिकी नेता या सांसद ताइवान जाते हैं, चीन तेज प्रतिक्रिया देता है. कभी सैन्य अभ्यास बढ़ाता है तो कभी कूटनीतिक विरोध दर्ज करता है. पूर्व अमेरिकी हाउस स्पीकर नैंसी पेलोसी के दौरे के समय भी चीन ने काफी आक्रामक रुख अपनाया था. इस बार भी चीन सैन्य गतिविधियां बढ़ा सकता है या तीखे बयान दे सकता है. First Updated : Sunday, 29 March 2026